पितृपक्ष यानि “श्राद्ध’उपासना” (भाग एक) का सच्चा रहस्य-बता रहे है- श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज…
शास्त्रों में बताया गया है की जब श्राद्ध पक्ष आता है तो पितृ लोक से पृथ्वी पर पितृ हमें देखने आते हैं। यदि हमने उन्हें उन दिनों में भुला दिया तो वे रुष्ट हो जाते है और यही वजह है जोकि हमें बहुत सारे कष्टों का सामना करना पड़ता है। इसे ही पितृ दोष कहते है। परन्तु यदि हम उनका श्राद्ध या तर्पण विधि पूर्वक करते है वे अत्यंत प्रसन्न होकर सुख समृधि देते हैं।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज पितृपक्ष के दूसरे भाग में कुछ उपाय बता रहे हैं कि कैसे पितरों को खुश करके घर में शांति लाई जा सकती है, बिगड़े काम बनाये जा सकते हैं।
पितृपक्ष यानि श्राद्धकर्म में तर्पण का सहज सामान्य और सच्चा सीधा कर्मकांड उपाय, जिसे आप करके अपने गुरु, इष्टदेव, ऋषि, पितरों को प्रसन्न करके अपना भौतिक व आध्यात्मिक कल्याण कर सकते है।
[भाग-2]
तो आइए जानते हैं कि तर्पण क्या है:-
तर्पण करने का सीधा अर्थ है-तृप्ति देना।अब किसको आप तृप्ति देना चाहते है? ये प्रश्न है।तो मनुष्य अपनी भौतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने उपयोगी लोगो को प्रत्यक्ष में अच्छे भोजन और अच्छे सद्व्यवहार से तृप्त करता है।तब उसे वे तृप्त हुए लोग अपनी सामर्थ्य का लाभ प्रसन्नता से देते है।ठीक यही मनुष्य अपने परिजनों की मृत आत्माओं को भी इसी स्तर पर तृप्त करता और उनसे अद्रश्य जगत की अद्रश्य कठनाइयों और विपदाओं में साहयता चाहता है।तो उन्हें इसी प्रकार के भोजन से तृप्त करता है।ये भोजन और जलपान आदि देशकाल के अनुरूप भिन्न भिन्न है।पर सबके पीछे का भाव प्रेम ही होता है।यो यदि भोजन देने में प्रेम भाव नहीं है,तो सब व्यर्थ होता है।ठीक यही बात तर्पण के विषय में भी लागु होती है की-तर्पण रूपी भोजन जलपान आदि को प्रेम और श्रद्धा से दिए जाने पर ही ये सब कर्मकांड को श्राद्ध और तर्पण आदि कहते है।
तर्पण में केवल इन्हीं एक पितर के लिए नहीं, पूर्व काल में गुजरे हुए अपने परिवार, माता के परिवार, दादी के परिवार के तीन-तीन पीढ़ी के पितरों की तृप्ति का भी आयोजन किया जाता है। इतना ही नहीं इस पृथ्वी पर अवतरित हुए सभी महान् पुरुषों की आत्मा के प्रति इस अवसर पर श्रद्धा व्यक्त करते हुए अपनी सद्भावना के द्वारा तृप्त करने का प्रर्यत्न किया जाता है।यो तर्पण को 7 भागों में विभक्त किया गया है-
1-गुरु-तर्पण
2-देव-तर्पण
3-ऋषि-तर्पण
4-दिव्य-मानव-तर्पण
5-दिव्य-पितृ-तर्पण
6-यम-तर्पण
7-मनुष्य-पितृ-तर्पण
अब सामान्य तरीके से ये सब 6 तर्पण करें और सम्पूर्ण लाभ उठाये।
कैसे करें सहज और सामान्य और सच्चा प्राचीन विधि से तर्पण और श्राद्ध कर्म उपाय:-
श्राद्धों के अंतिम दिन में प्रातः उठकर स्नानादि करके, जो भोजन बनाना चाहे,उसे प्रेम और श्रद्धा से बनाये और जल और खीर सब तैयार करके अपने पूजाघर में आसन और धुप दीप आदि करके सहजता से बैठे।अब उस भोजन के सामान को समान रूप से 6 भाग अलग अलग प्लेट या थाली में कर ले,और
1-अब पहले अपने गुरु को गुरु मंत्र से नमन करते हुए,उन्हें पहली थाली से सभी प्रकार के खाने का एक एक टुकड़ा उनकी तस्वीर या मूर्ति से लगाते हुए अपनी ही भाषा में भोजन करने के लिए प्रार्थना करें और उन्हें भोग लगाएं,व् जल भी पीने को उनके मुख से लगाये।
2-अब ठीक ऐसे ही दूसरी थाली से अपने इष्ट देव व् देवी को भोग व् जल दें।वेसे ये शास्त्रों में त्रिदेव व् त्रिदेवी को तर्पण होता है।पर आप अपने ही इष्टदेव देवी को दें।
3-अब तीसरी थाली से अपने कुल ऋषि या नहीं पता तो-सप्त ऋषियों को उनका नाम लेते हुए भोग व् जल दें।प्राचीन ऋषि- व्यास, वसिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनी, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ऋषि तर्पण द्वारा की जाती है।
यदि ये भी नहीं कर सके तो और भी सहज और सरल व् सटीक उपाय है की-आपका जो भी गोत्र हो,व्ही गोत्र ही पूर्वकाल में ऋषि रहे होते है।यो अपने कुल व् माता के कुल के ही गोत्र का नाम ऋषि रख बोलते हुए भोग लगाये।यह सबसे उत्तम ऋषि पूजा होती है।
4-अब अपने परिजनों में कोई बड़े निष्ठावान या नामी ग्रामी व्यक्ति हुए हो,उन्हें भी ऐसे ही चौथी थाली से भोग व् जल दें।
5-अब ऐसे ही पांचवीं थाली से अपने परिवार या कुल में हुए कोई दिव्य तपेश्वरी पितृजन को भोग व् जल दें।
6-ऐसे ही छठी थाली से यमदेव को भोजन व् जल दें।
7-और अंत में अपने परिवार के पुरुष व् स्त्री रूपी परदादा परदादी व् दादा दादी व् मृत माता या पिता और ननसाल के पितरों के नाम लेते हुए उनके नाम का भोजन का भोग व् जल दें।
-जिस देव या देवी या ऋषि या दिव्य मानव पितृ की मूर्ति या चित्र उनका भोग लगाने को नहीं हो,तो पूजाघर में जल रही ज्योति पर उनका भोग छुला व् खीर व् ज्योत के पास जल के छींटें लगा लेते है।
और अंत में उस सब भोजन को सारे परिवार में प्रसाद रूप में बाँट दे।ये सब भोजन और जल का उन 6 पितरों को भोग लगने से प्रसाद बन जाता है।यो उसे स्वयं परिजनों सहित ग्रहण करना चाहिए और अतिरिक्त भोजन को मन्दिर में ब्राह्मण और जीवों को और भिखारी को भी खिलाने को देना चाहिए।
यही सबसे प्राचीन और सही तर्पण और श्राद्ध कर्म है।जो आप सहित देव व् पितरों को सन्तुष्ट करेगा और आपका सर्वकल्याण करेगा।
और अधिक तप तर्पण के लिए स्वयं सारा परिवार या जो भी यज्ञ कर सकते हो,वे अपने अपने हाथ में गंगा जल लेकर 1-1 माला जप इन सभी ऊपर दिए गुरु इष्ट आदि 7 पितरों को अर्पित करते हूए, अपनी मनोकामना बोलते हुए यज्ञ के पास भूमि पर छोड़ें और अब जप करते हुए यज्ञ करें।यज्ञ समापन पर थोड़ी देर वहीं बैठकर इन सबका ध्यान करते हुए अपनी सफलता का आशीर्वाद लें।और यज्ञ को नमन करते हुए उठ जाये।अब चाहें तो अपने दैनिक कार्य करें।
इस सम्बन्ध में और भी शेष ज्ञान अगले लेख में सहजता रूप में आपको आपके सर्वकल्याण को बताऊंगा।
इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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