ये आज तक के सबसे बड़े और प्रसिद्ध भविष्वाणी करने वाले भविष्यवेत्ता कीरो यानि काउंट लुइस हेमन के सीधे हाथ की छाप चित्र है।ओर इसमें आप ऐसी अद्धभुत रेखाएं देखेंगे,जो आज तक नहीं देखी-विशेषकर:-
1-दोहरी मस्तक रेखा यानि राहु रेखा या कुंडलिनी रेखा।
2-अन्तर्द्रष्टि यानि अन्तःप्रेरणा रेखा या इंट्यूशन रेखा।
3-दीक्षा रेखा
कुंडलिनी रेखा:- प्रत्येक मनुष्य में कुंडलिनी शक्ति के जागरण के तीन स्तर भेद है।
1-स्थूल शरीर में जागरण:-इसमें केवल मूलाधार चक्र ही जाग्रत होता है और उसमें जो चार कमल दल यानि चार शक्ति के-अर्थ-काम-धर्म-मोक्ष क्षेत्र है,उनमें से कोई एक जाग्रत होता है और बाकि तीन उसकी सहायक शक्तियां होती है।जैसे-
1-शारारिक बल का असाधारण जागर्ति।
जैसे-राममूर्ति, सैंडो आदि पहलवान,जो पहले कमजोर थे और फिर किसी गुरु या विशेष अभ्यास के करने से इनमें अद्धभुत शारारिक शक्ति की प्राप्ति होती है।
2-धन की शक्ति का जागरण।
उदाहरण-रॉकफेलर आदि धनवान,जो पहले सामान्य लोग होते है और फिर अपने बल पर संसार के सबसे धनी बन जाते है।
3-नेतृत्व शक्ति का जागरण।
उदाहरण-नेपोलियन,गांधी,आदि,जो निम्न से विशिष्ठ और असाधारण बन जाते है।
4-धार्मिक आंदोलन के साधारण से असाधारण बने धार्मिक नेता।
2-सूक्ष्म कुंडलिनी जागरण:-ये सूक्ष्म शरीर में जो कुण्डलिनी जाग्रत होती है।जिसका विषय केवल मात्र परलौकिक द्रश्य और द्रष्टा होता है।यहां ये एक मात्र द्रष्टा भर होते है।सृष्टा नहीं होते है,यानि केवल जो हो रहा है या होगा,उसे देखना और उसे बताना इनकी सामर्थ्य में होता है।ये उस देखे में कुछ भी बदलाव नहीं कर सकते है।यो ये केवल त्रिकालज्ञ होते है।और उसमें भी इनके स्तर भेद होते है।तो उनमें से एक सिद्ध
ये भविष्यवेत्ता, चमत्कारी योगी आदि।
3-योगी:-जो द्रष्टा और स्रष्टा दोनों होते है।ये नवीन धर्म पंथ चलाने वाले या उसमें संशोधित करने वाले अवतरित या अवतारित लोग,जो स्वयंभू ईश्वर की उपाधि पाते है-जैसे-राम,कृष्ण,महावीर-बुद्ध आदि ओर इन से दूसरे स्तर के योगी वे होते है,जो किसी अन्य ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति करते हुए उससे जुड़े होने से उसके संदेशों को धर्म बनाकर प्रसार करते है,जैसे-मूसा,ईसा,महोम्मद आदि।ये अति असाधारण होने से योगी कहे जाते है।ये कारण शरीर के स्तर के योगी सब युगों में पैदा होते है।
और ये दूसरे स्तर के मनुष्य जिनके सूक्ष्म शरीर में जाग्रत कुंडलिनी के भी अनेक स्तर भेद है-की वे मूलाधार से लेकर कंठ चक्र तक के पांच चक्रों में किस चक्र पर उनकी शक्ति जाग्रत होकर स्थित हुयी है।यो यहाँ ये कीरो इन्हीं सूक्ष्म स्तर के कुण्डलिनी जाग्रत सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में आते है।
कीरो:-
कीरो के दिए गए सीधे हाथ के चित्र में जीवन रेखा से चली भाग्य रेखा और चन्द्र पर्वत से चली भाग्य रेखा का मिलन उसकी पहली मस्तक रेखा पर हुआ है।ये बड़ा जबरदस्त मिलन है।और इसी मिलन स्थल से एक रेखा शनि पर्वत के नीचे पूर्ण हुयी और दूसरी सूर्य पर्वत पर प्रबल होकर सूर्य और बुध पर्वत के बीच पूर्ण हुयी है।ये अपार सच्ची प्रसिद्धि को देती है।
ह्रदय रेखा का अंत दो रेखाओं से गुरु पर्वत पर हुआ है।और वहाँ सिद्ध गुरु वलय या दीक्षा रेखा स्पष्ट बनी है।ये गुरु यानि ज्योतिष आदि ज्ञान में सिद्धि देती है।
दूसरी मस्तक रेखा जिसके बारे कीरो कहते है की ये पहले नहीं थी,बल्कि ये मध्यायु के बाद बनी थी।तो ये राहु से गुरु पर्वत तक पूरी और स्पष्ट और बिना कटे फ़टे बनी है।ये गुरु पर्वत से चली या ये राहु पर्वत से चली है।वेसे ये राहु से चलकर गुरु पर्वत तक पहुँची है।गुरु राहु का उच्च योग व्यक्ति को तांत्रिक विद्या और ये योग धार्मिक हो या सामाजिक परम्पराओं और प्रचलित मान्यताओं से हट कर अपना व्यक्तिगत अनुभूति पर खरा चिंतन देता है। पर ये मस्तिष्क की अतिरिक्त शक्ति यानि आज्ञा चक्र यानि मन की पूर्ण तीक्ष्ण एकाग्र शक्ति की प्राप्ति को बताती है।जिसमें कल्पना नहीं होती यथार्थ ज्ञान होता है।ये थर्ड आई की रेखा है।
दूसरे अंतरप्रेरणा यानि इंट्यूशन रेखा है-राहु और चन्द्र पर्वत के सन्धिकाल से निकल कर बुध पर्वत पर अर्द्ध गोलाकार बनकर पहुँचना।अपार बौद्धिक ज्ञान बल और निर्णय शक्ति को देती है।
इस रेखा के बुध पर्वत पर पहुँचने पर उसके साथ दो तीन रेखाएं साहयक रेखाएं भी है।जो व्यक्ति को मिली विद्या से मनचाहा धन और सहयोगियों की प्राप्ति देती है।
और मूल ह्रदय रेखा का अंत पतलेपन में समाप्त होना व्यक्ति अपनी प्राप्त विद्या को किसी को नही देता या उससे कोई उत्तम शिष्य ले नही पाता है।परिणाम वो विद्या का कुछ ही बाहरी भाग संसार में प्रकट रह जाता है और गहन और सिद्ध भाग उसी के साथ चला जाता है।
अर्थात यहां आप देखेंगे की-सिद्ध गुरु के शक्तिपात से और उसके द्धारा दिए गए मंत्र जप व् ध्यान विधि ने इनकी थर्ड आई यानि अन्तर्द्रष्टि को खोल दिया और केवल सामने आये किसी भी व्यक्ति या वस्तु के और ज्योतिष आंकड़ों को देखकर उसमें छिपा भूत और वर्तमान और भविष्य को जान लेने की समझ इनमें आ गयी।पर यहाँ इस त्रिकालज्ञ अवस्था की एक समय दुरी यानि आने वाले वर्षों की लिमिट रही है।अर्थात इनमें काल के परे देखने की शक्ति नही है।
यहाँ मूल विषय है, आपको मनुष्य के हाथ में उसके अंदर छिपी अद्रश्य शक्तियों का पता उसकी रेखाओ के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान से मिलना और उन्हें जानना की ये वास्तव में होती है और कहाँ व् केसी अवस्था में होती है।
यो तो कीरो के हाथ में और भी रेखाएं है।उनके विषय में आगामी लेखों में कहूँगा।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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