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12 जनवरी स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन पर विशेष : हस्तरेखा विज्ञान और कुण्डलिनी जागरण की स्थिति का विश्लेषण, बता रहे हैं – श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज



12 जनवरी स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिवस पर विश्व में पहली बार हस्तरेखा विज्ञान से उनके हस्तरेखा में देखें उनका कुण्डलिनी जागरण की स्थिति का विश्लेषण जो आपको भी प्रेरित करेगा अपनी कुंडलिनी रेखा जानने को:-बता रहे हैं राजयोगी स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी…



ये सीधे हाथ की छाप 6 अप्रैल 1895 को स्वामी विवेकानंद जी की ली गयी थी,जो उनके रामकृष्ण मिशन की उनकी जीवनी में प्रकाशित हुयी।

मनुष्य के तीन प्रमुख आत्म शरीर है-1-स्थूल-2-सूक्ष्म-3-कारण शरीर।
और उनके तीन ही प्रमुख चक्र है:-1-मूलाधार चक्र-2-ह्रदय चक्र-3-आज्ञा चक्र।और बाकि चक्र इन चक्रों के प्रतिक्रिया और समापन चक्र हैं।
और इन्हीं तीनों शरीर और चक्रों को मनुष्य के हाथ में बताती तीन रेखा मुख्य होती है।
1-जीवन रेखा।
2-मस्तक रेखा।
3-ह्रदय रेखा।

1-जीवन रेखा:-
मनुष्य की जीवन शक्ति यानि जीवन शक्ति का केंद्र स्थान मूलाधार चक्र का कितना जागरण हुआ है और उसकी स्थिति प्रारम्भ यानि हाथ के अंगूठे की और से केसी है और अंत में मणिबंध की और कैसी है? ये जीवन रेखा बताती है।
2-ह्रदय रेखा:-
ये मनुष्य के समस्त इच्छाओं और भावनाओं के समूह जिसे योग में मन कहते है,उसका स्थान ह्रदय चक्र है और ह्रदय रेखा की स्थिति ही मनुष्य के ह्रदय चक्र की स्थिति को बताती है की उसके ह्रदय चक्र का प्रारम्भिक जागरण जो की कनिष्ठा ऊँगली की और से होता है,वो वहाँ से केसा है और फिर उसका अंतिम जाग्रत अवस्था और अंतिम स्थान गुरु पर्वत पर पहुँच कर केसी पूर्ण या अपूर्ण हुयी है।अर्थात ह्रदय चक्र का सम्पूर्ण जागरण हुआ या नहीं।यानि अभी केवल भौतिक जगत का जागरण हुआ है या आध्यात्मिक जगत का जागरण हुआ है।
भौतिक जगत का जागरण को ये ह्रदय रेखा शनि और गुरु पर्वत के बीच में दोनों ऊँगली की जड़ तक पहुँचती है।और यहां भी क्या स्थिति बनी है यानि व्यक्ति का कार्य क्षेत्र भौतिक जगत और उस पर प्रभुत्त्व है या उसका केवल अपने लिए उपयोग मात्र है,जिसे स्वार्थी होना कहते हैं या उसका उपयोग करते हुए जगत का कल्याण करना है।ये ह्रदय रेखा का अध्ययन बताता है।
3-मस्तक रेखा:-
मस्तक रेखा व्यक्ति के आज्ञा चक्र की स्थिति को बताती है।वेसे प्रत्येक रेखा के दो छोर होते है।और पहला छोर यानि प्रारम्भ उस मुख्य चक्र का प्रतिक्रिया चक्र होता है।जेसे मस्तक रेखा का पहला प्रारम्भिक छोर है स्वाधिष्ठान चक्र और अंतिम है आज्ञा चक्र।स्वाधिष्ठान चक्र से मनुष्य के भौतिक अहं यानि भौतिक मैं की स्थिति का पता चलता है,यो मस्तक रेखा का प्रारम्भ अंगूठे की जड़ से कैसा हुआ है।इससे उसके स्वाधिष्ठान चक्र की स्थिति का पता चलता है और अंत में उसके आज्ञाचक्र की स्थिति का पता चलता है।यो मस्तक रेखा का अंतिम स्थिति केसी रही और समापन कैसा हुआ।यदि मनुष्य के हाथ में दो मस्तक रेखा है,जेसे की प्रसिद्ध ज्योतिषी भवुष्यवेत्ता कीरो के हाथ में स्पष्ट दिखती है।और अनेक मनुष्य के हाथ में ये आगे से दो फाड़ या भाग में विभाजित हो जाती है।ऐसे व्यक्ति के मन की दशा उसे जीवन और उद्देश्य को लेकर बनाई किसी भी योजना या निर्णय के अंत में दो निर्णय हो जाते है यानि वो वहां अटक जाता है।यो ये एक ही रेखा बनी रहनी उत्तम है।ये दोहरी रेखा जो अतिरिक्त शक्ति को बताती है।ये किसी भी रेखा के दो भाग से उसे किसी और की अतिरिक्त साहयता यानि गुरु या दैविक दीक्षा शक्ति को बताती है।यो ये अध्ययन का बड़ा आवश्यक है।
यहाँ स्वामी जी के हाथ में उनकी जीवन रेखा के पीछे शुक्र रेखा या मंगल रेखा भी हलकी सी स्पष्ट दिखती है।जो उनके मंगल यानि कर्मठता या कर्म की प्रबलता और शुक्र यानि एश्वर्य जिसका आधार है,यानि मनुष्य का बीज-वीर्य या रज है।ये ब्रह्मचर्य शक्ति को साधने को बताती है। और यहाँ ये रेखा उनके वीर्य शक्ति के उत्थान को बताती है।और ये मंगल और शुक्र रेखा स्त्रियों शिष्यों के सहयोग को बताती है।
यहाँ इनकी जीवन रेखा और मंगल रेखा या शुक्र रेखा और भाग्य रेखा यानि भाग्य जो है वो इस सबका परिणाम कैसा है या रहेगा ये बताती है।और साथ ही यहां मस्तक रेखा का भी मिलान है। यो ये तीन रेखा और इनकी मिली शक्ति और उसका परिणाम है-भाग्य रेखा। जो आगे चलकर उठकर ह्रदय रेखा में जाकर मिल गयी और इसके वहां पहुँचने पर वहाँ ह्रदय रेखा का अंत तीन त्रिशूल के रूप में हो रहा है।ये ही बड़ा उच्चतम योग बना है।यहां बताये सारे विषय का।
और वहाँ से यानि ह्रदय रेखा से एक रेखा गुरु पर्वत पर आध्यात्मिकता की प्राप्ति को बताती है और एक रेखा शनि की यानि योग व् तपस्या और संघर्ष से सफलता की प्राप्ति को बताती है और ह्रदय रेखा के अंत से जाती एक तीसरी रेखा का अंत गुरु और शनि के मध्य में पूर्ण अंत से हुआ है।जो आध्यात्मिकता के सम्पूर्ण होने की प्राप्ति को बता रही है।
आप देखेंगे की यहाँ जीवन रेखा और भाग्य रेखा नीचे से बहुत ऊपर तक एक होकर उठी है।यानि कम से कम 28 वें वर्ष तक।तभी इनका सही से भाग्य जाग्रत हुआ है।और ये जीवन रेखा से जुडी भाग्य रेखा ये बताती है की इनका स्वयं का स्वतंत्र भाग्य नहीं है,उसमे किसी और का भाग्य समल्लित है।यानि इनके गुरु का भाग्य समल्लित है।जैसा की सभी पढ़ने वाले जानते है,की इनके गुरु रामकृष्ण परमहंस अंत में अपनी कुंडलिनी शक्ति का इनमें दान करते हुए इनमें समा गए थे।और सामान्य व्यक्ति के हाथ में ऐसी रेखा होने का अर्थ है, उसका परिवार या उसकी विपरीतलिंगी साथी का समल्लित भाग्य उसे मिलना या होना बताता है।
यहाँ मस्तिष्क रेखा के अंतिम छोर के पास से मिश्रित होकर उठी एक रेखा, जो शनि पर्वत पर चढ़ी है।पर पूरी ऊपर को नहीं चढ़ी है।ये स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण यानि मैं कौन हूँ, के ज्ञान जागरण को बताती है।और ठीक उसी स्थान से एक रेखा सूर्य पर्वत की और गयी है।यो ये बताती है की व्यक्ति को मैं कौन हूँ यानि स्वाधिष्ठान चक्र में आत्मा का ज्ञान यानि वेदिक ज्ञान का पक्का जागरण हुआ है।क्योकि सूर्य पर्वत मनुष्य के आत्मिक ज्ञान को बताने वाला क्षेत्र है।और इसी सूर्य पर्वत तक एक-एक करके दो रेखा राहु क्षेत्र से उठ कर गयी है।ये राहु पर्वत से उठी रेखा ही पूर्व जन्म का भाग्य फल होती है।जैसा स्वामी जी के बारे में इनके गुरुदेव कहते थे की-ये सप्त ऋषियों में से एक ऋषि है।
ये या ऐसी राहु रेखा मनुष्य को मिलने वाले अतिरिक्त शक्तिपात रेखा यानि पूण्य बल की अतिरिक्त प्राप्ति को बताती है और ये ही पूण्य बल ही कुंडलिनी रेखा भी कहलाती है।राहु पूर्व जन्म का शाप बल या वरदान बल को बताता है।अकस्मात दर्शन और तन्त्र मंत्र यन्त्र की समल्लित शक्ति मिलने यानि सिद्धि को बताता है की व्यक्ति में मायाविक शक्तियों यानि प्रकर्ति की पंचभूत शक्तियों पर कितना अधिकार है।ये विज्ञानं रेखा यानि विशिष्ठ ज्ञान रेखा भी होती है।यो राहु रेखा हो तो उसका विशेष अध्ययन किया जाना चाहिए।
फिर मस्तक और राहु क्षेत्र से उठती सूर्य रेखा और उसका तरिछा होकर सूर्य और बुध पर्वत के बीच प्रगाढ़ होना, अपने ज्ञान और बुद्धि पर पकड़ और उसका कैसे प्रयोग करना है इसको बताता है।यहां ये राहु रेखायें इन पर दो बार उच्चतर शक्तिपात से कुण्डलिनी जागरण को बताती है।की इनके इन रेखाओं के बीच के अंतराल के समय में दो बार उच्चतर शक्तिपात होने से इन्हें उच्चतर अतिरिक्त पुण्यबल की प्राप्ति हुयी है।जिससे इनका सूर्य चक्र जाग्रत यानि कुण्डलिनी जाग्रत हुयी है।
इनकी ह्रदय रेखा बहुत अच्छी है,यो स्वामी जी ने उच्चतर शुद्ध ह्रदय और उसके उच्चतर मनुष्य समाज की उन्नति के विशुद्ध भावो को पाया है।
यहां आप देखेंगे की शनि पर्वत के नीचे इनके ह्रदय रेखा से एक रेखा मस्तक रेखा को काट नही रही बल्कि उस में मिल रही है।ये ह्रदय और मस्तक रेखा और ठीक उसी समय के करीब जीवन व् मंगल रेखा का एक होना भी बताती है।यहाँ एक बार इस समय में जीवन शक्ति मूलाधार चक्र + ह्रदय शक्ति यानि ह्रदय चक्र और मस्तक शक्ति यानि आज्ञा चक्र मिलकर तीन शक्ति एक हुयी है।जो इन्हें एक गहरी समाधि होने को बताती है और बाकि दो तीन ह्रदय रेखा से निकली रेखाएं मस्तक रेखा को प्रारम्भ में यानि प्रारम्भिक समय में अचानक मुड़कर छु रही है।ये अकस्मात जीवन में मिले आघात को बताती है और इनके जीवन में बदलाव व् इनकी अनिच्छा को भी बताती है।की मैं किसी के भी अधीनस्थ नहीं बनूँ यानि मैं अपनी आत्मा का स्वामी स्वयं बनु।नाकि कोई और मेरे पर हावी हो जाये।यो ये जबरदस्त प्रतिकार को बताती रेखाएं है।और ऐसा इनके जीवन में इनमे और इनके गुरु के मध्य और संसारिक परिस्थितयों के मध्य हुयी घटनाओ को देखने पर इस सत्यता का पता चल जाता है।
और सूर्य पर्वत पर अनेक रेखाओं के निकट उनसे मिलता हुआ एक स्वतंत्र त्रिकोण भी बना है।जो शनि पर्वत की ओर एक कोना लिए है यानि शनि का धार्मिक और गहनता भरा दर्शन देता है। यानि तीनों इंगला+पिंगला+सुषम्ना= कुण्डलिनी जागरण यहां घटित हुआ।यानि ये सूर्य पर्वत पर घटित हुआ है और सूर्य आत्मा का अंतिम क्षेत्र है।यहाँ-1-सूर्य पर्वत पर शुभ स्थिति-2-गुरु पर्वत पर शुभ अंत-3- शनि पर्वत पर शुभ अंत और राहु पर्वत से उत्थान।यो ये बना और स्पष्ट हुआ यहाँ कुण्डलिनी जागरण का होना।यही मेरा आपको बताने और दर्शाने का हस्तरेखा का संछिप्त विषय है।

स्वामी विवेकानंद एक प्रमाणिक व्यक्तित्व है।और उनका हाथ अध्ययन को प्रमाणिक है।ध्यान से इस लेख को समझते हुए अध्ययन करें।तो बहुत ज्ञान का विकास होगा।

यहाँ इनके ऊपर हुए बड़े शक्तिपात राहु रेखा के अध्ययन से आप पाएंगे की- इनके व्यव्क्तित्व में दुहरापन रहा-एक इनका अद्धैतवाद और दूसरा भक्तिवाद का अंतर संघर्ष।जो अनेक बार इनके अंदर आक्रोश को और विरोध को भी प्रकट करता रहा।ये इतने उच्चे गुरु के पास सब प्राप्त करने पर भी उनके समाधि लेने के बाद अपनी देश की यात्रा के बीच पवहारी बाबा से 18 दिन दीक्षा लेने बड़े व्यग्र रहे थे।तब प्रश्न उठता है।की ऐसा क्या शेष ज्ञान था जो इन्हें इनके गुरु रामकृष्ण से नहीं मिला,जो पवहारी बाबा से लेना चाह रहे थे और इन्हें उस समय सूक्ष्म दर्शन देते हुए रामकृष्ण के लगातार इन्हें मना पर इन्हें ये दीक्षा त्यागनी पड़ी??वो ज्ञान की अतृप्ति क्या थी? ये किसी और लेख में इनकी इसी हस्तरेखा के विश्लेषण द्धारा कहूँगा।ऐसी अनेक बातें आप इस हस्तरेखा में देख पाएंगे।
इनकी विदेश यात्रा आदि के अध्ययन को इनका चन्द्र पर्वत से हथेली के बाहर से आती और जाती रेखाओ के अध्ययन से जान सकते है।अन्यथा इस विषय में भी बताऊंगा।ये इनका सीधा हाथ यानि भविष्य हाथ है।और इनके पूर्वजन्म के अध्ययन को उल्टा हाथ होना चाहिए तब और भी विशेष ज्ञान का पता चलता है।




श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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