यह भाग हस्तरेखा विज्ञान का दसवां भाग है। इससे पहले के बाकी भागों की कीमती जानकारियां पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें या फिर आप खबर 24 एक्सप्रेस की वेबसाइट पर जाकर श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के सभी कीमती और अनमोल ज्ञान को पढ़ सकते हैं।
हस्तरेखा विज्ञान (भाग-9), हाथ में तिल होने के क्या हैं फायदे? हाथ में कहां और किस स्थिति में तिल होते हैं लाभकारी, जानें श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज से
तो आइए जानते हैं कि कैसे केतु रेखा डालती है जीवन पर शुभ- अशुभ प्रभाव
हस्तरेखा शास्त्र में केतु ग्रह और उसके मनुष्य पर क्या क्या शुभ अशुभ प्रभाव होते है,इस विषय पर आने अनजानी बातें स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी बता रहे है की:-
हथेली में केतु पर्वत का स्थान कलाई से ऊपर यानि मणिबंध के ऊपर और जीवन रेखा के अंत से लेकर, मस्तक रेखा के अंदर के भाग तक और चंद्र पर्वत के ऊपर और भाग्य रेखा के साथ साथ उसके दोनों और होता है ।
केतु मोक्ष का कारक ग्रह है यानि जीवन के अंत में मृत्यु के कारणों में उच्चता या निम्नता लेन वाले कर्मों से मृत्यु के बाद का जीवन कैसा होगा,ये केतु का कार्य है,इस क्षेत्र से कोई स्पष्ट रेखा निकल कर जीवन रेखा में मिल रही हो तो,व्यक्ति के जीवन में विपरीत लिंगी या किसी विपरीत लिंगी यानि स्त्री के लिए पुरुष और पुरुष के लिए स्त्री देवी या देव की अद्रश्य शक्ति साहयता करने से या उसकी प्रेरणा से बहुत उन्नति और समय समय पर कठनाइयों,रोग,संकट आदि में साहयता मिलती है
* कलाई के ऊपर मणिबंध रेखा के ऊपर या जोड़ पर या जीवन रेखा पर मछली का चिह्न बन रहा हो, तो व्यक्ति को धन और प्रतिष्ठा की कभी कमी नहीं रहती। ऐसे लोग जीवन में अपने किसी रहस्यवादी ज्ञान या किसी विशिष्ठ अभ्यास-जैसे-व्यायाम,भाषा या हाथ की सफाई,ताश,योग या खेल के किसी पक्ष या स्टाइल के विकट अनुसाशन अभ्यास करके अपने अधिकार में कर लेने से, उस क्षेत्र में उच्चतर स्तर पर पहुँच जाते है या किसी बड़े पदों पर जाते हैं और समाज में सम्मानपूर्वक जाने जाते हैं।
* यदि उलटे हाथ ये मछली का चिन्ह सही हो और सीधे हाथ में कलाई की और खुला हो,तो पूर्व जन्म और किसी विपरीत लिंगी के प्रेम से भाग्य बढ़ता है,पर उसको धोखा देने या उसके किसी और से विवाह हो जाने के बाद, उसी से तथा औरों से भी धोखा मिलने और संघर्ष से भाग्य में अनेक बार रुकावट आती है और रुक रुक कर भाग्य में उन्नति होती है।
* या केतु क्षेत्र से कोई छोटी सी द्रढ़ स्पष्ट रेखा भाग्य रेखा के साथ चले,पर भाग्य रेखा में मिले नहीं या उस तक पहुँचते पहुँचते धूमिल होने लगे तो,व्यक्ति के जीवन में उस समय में विपरीत लिंगी से बस प्रगाढ़ प्रेम तो होता है,पर उससे विवाह नहीं होता है। कोई भी साहयक व्यक्ति की साहयता से भाग्य में सफलता मिलती है।
और जीवन रेखा का अंत इसी केतु क्षेत्र पर बिखरी रेखाओं से हो,तो व्यक्ति की जीवन शक्ति या वीर्य या रज बहुत भोगवाद में या ऐसी ही सोच में या किसी रोग के कारण ज्यादा निकलने से शरीर कमजोर,स्थिल रहता है और जीवन के अंतिम समय में किसी रोग से अस्पताल में वेंटिलेटर पर कष्ट पाकर होती है।
* जीवन रेखा से इसी क्षेत्र में छोटी छोटी रेखाएं निकल कर नीचे को गिरती है,तो व्यक्ति की अपने कार्य क्षेत्र में भी और घरेलू जीवन में और प्रेम सदा असफलताएँ मिलने से मानसिक कष्ट रहता है और जब भी ऐसा व्यक्ति बीमार पड़ता है,तो उसे अन्य व्यक्ति की अपेक्षा, ज्यादा दिन बीमारी से जूझना पड़ता है।
* चन्द्र पर्वत से निकली अच्छी भाग्य रेखा,मस्तक रेखा के नीचे इस केतु पर्वत पर जाकर समाप्त हो जाये या यहाँ धूमिल सी होती हुयी कमजोर पड़े तो,व्यक्ति की जीवन के प्रारम्भ में जल्दी उन्नति होकर चरम मिलता है और 21 से 35 वे वर्ष में उसे बड़ी अच्छी शीघ्र उन्नति और सरकारी सर्विस और विदेश यात्रा आदि सब पाकर,फिर से अवनति का विकट सामना करना पड़ता है और यदि मस्तक रेखा से ऊपर भाग्य रेखा नही हो,तो व्यक्ति फिर ऐसे अच्छे दिन नहीं देख पाता है।उस पर सदा पड़ोसी के द्धारा या गुप्त शत्रु के या यात्रा करते में टोटको से गुजरने से सभी प्रकार की हानि होती है।
*केतु पर्वत के उन्नत होने से,जातक के जीवन में इनका प्रभाव शुख सुविधा बैंक बैलेंस भौतिक उन्नति से होता है ।
*ज्योतिष शास्त्र में,केतु ग्रह की दृष्टि जातक के जीवन पर पांच वर्ष से बीस वर्ष तक देखी जाती है।यदि जातक के हाथ में केतु पर्वत विकसित है,साथ ही व्यक्ति की भाग्य रेखा स्पष्ट हो तो,व्यक्ति अपने जीवन में सभी सुख भोगता है।ऐसे व्यक्ति सामान्य या गरीब घर में जन्म लेकर अपने जीवन में अच्छी उन्नति करते देखे गए है।
*यदि हाथ में केतु पर्वत कमजोर हो और भाग्य रेखा भी सामान्य या टूटी फूटी या कमजोर हो, तो जातक अपने जीवन में वहीं का वहीं बना रहकर,विशेष तरक्की नही कर पाता।और अपने बचपन के कुछ समय बाद ही, युवा काल तक का समय यानि 16 से लेकर 25 या 34 साल तक संधर्ष और गरीबी में ही जीकर गुजरता है।
*यदि व्यक्ति के केतु पर्वत पर क्रॉस का चिह् होता है, तो वह चिड़चिड़ा और बार बार खांसी और बुखार के आते रहने से, बचपन में बीमार रहते है,यो उनकी पढ़ाई में परिवतर्न के साथ साथ अच्छे से नही हो पाती है।
*केतु क्षेत्र से शुरू होने वाली भाग्य रेखा वाला व्यक्ति की उन्नति लगभग 25 या 28 वे वर्ष से होती है और उसे शिक्षा में और जीवन में बड़े संघर्ष झेलने पड़ते है,माता पिता भाई बहिन का सुख होने पर भी नहीं मिलता,यो वो अपने इन्हीं अनुभवों के ज्ञान से ही अपना भाग्य बनाता है और जीवन के अंत में सफल होता है।बस उसकी भाग्य रेखा शनि पर्वत तक जानी चाहिए और सूर्य रेखा भी स्पष्ट हो,अन्यथा ये नहीं होने पर संघर्ष केवल संघर्ष ही रह जाता है।
उपाय:-इस पर्वत को अंगूठे से सहला कर उस स्पर्श का आँख बंद करके मन ही मन ध्यान करते हुए गुरु मन्त्र या ॐ कं केतुवे नमः का जप करे।
*वजन के अनुपात से लहसुनिया रत्न को पंचाम्रत से स्नान कराकर प्रातः भोरकाल या साय संध्याकाल के क्षण में ही सोने या चांदी में जड़वाकर, मध्यमा ऊँगली या कनिष्ठा ऊँगली में पहनना चाहिए।
“इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं? घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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