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21 अगस्त को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का निधन हो गया। कल्याण सिंह के निधन से भारतीय राजनीति ने जो रिक्ति आई है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
कल्याण सिंह जमीन से जुड़े नेता थे। हिंदुत्व, कड़ा शासन, किसान, शिक्षा और स्वाभिमान इन सभी को मिला दिया जाए तो कल्याण सिंह बनते हैं। उत्तर प्रदेश का विकास शिक्षा के क्षेत्र में ठोस कदम और किसानों के प्रति चिंता और लगाव उन्हें देश की अन्य पार्टियों के नेताओं से तो क्या बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से भी अलग सर्वोच्चता पर रखता है। हिंदुत्व और भगवान श्री राम के प्रति आस्था की यदि बात की जाए तो इस मामले में कल्याण सिंह से ऊपर कोई हो ही नहीं सकता, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी नहीं।
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बात आती है कल्याण सिंह और पिछड़ा वर्ग की जिसे बाबूजी कल्याण सिंह के स्वर्ग सुधारने के बाद भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश चुनाव में साधना चाहती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता आखिर क्यों बाबूजी को पिछड़ी जाति मात्र से जोड़ना चाहते हैं? क्या कल्याण सिंह मात्र पिछड़ा वर्ग के नेता थे? क्या कल्याण सिंह का त्याग और बलिदान जातिगत राजनीति से भी छोटा रह गया? अगर नहीं तो क्यों उनके स्वर्ग सिधारने के बाद वरिष्ठ भाजपा नेता जातिगत राजनीति पर उतर आए हैं? उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जातिगत टिप्पणी करते हुए अखिलेश यादव पर बाबूजी की अंतिम विदाई में न आने पर तंज कस रहे हैं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मुस्लिम वोट बैंक व पिछड़ों पर ट्वीट करते हुए बाबूजी के अंतिम संस्कार में अखिलेश यादव के नहीं आने पर बयानबाजी कर रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता साक्षी महाराज भी अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव को उल्टी-सीधी कह रहे हैं।
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सात आठ महीने बाद उत्तर प्रदेश में चुनाव है और माहौल बनाने के लिए अभी से बयान बाजी चालू कर दी गई है।
यह सही है कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कल्याण सिंह की अंतिम विदाई में नहीं पहुंचे किंतु उन्होंने अपने ट्वीट के माध्यम से कल्याण सिंह को याद किया और उन्हें श्रद्धांजलि भी दी। माना कि अखिलेश यादव मुस्लिमों की राजनीति करते हैं किंतु इसका अर्थ यह तो नहीं कि बाबूजी के जाने के बाद उनके त्याग और बलिदान को पिछड़ों की राजनीति से जोड़ दो। अखिलेश यादव आए या नहीं आए वह उनका स्वयं का निर्णय रहा किंतु इस मुद्दे को जातिगत राजनीति से जोड़कर बाबूजी का मान सम्मान, उनकी गरिमा को तो कम नहीं किया जाना चाहिए।
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वास्तव में कल्याण सिंह बहुत स्वाभिमानी नेता थे, उनके जैसे स्वाभिमानी नेता आज की राजनीति में नहीं होते। उन्होंने भाजपा के लिए अपने आपको कई बार न्योछावर कर दिया। आज भाजपा जिस ऊंचाई पर है उस का सबसे बड़ा श्रेय कल्याण सिंह को जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनना, राम मंदिर के लिए अपने को न्योछावर कर देना ये बहुत बड़ी बात है। कल्याण सिंह अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते थे, जिस पार्टी के लिए उन्होंने सब कुछ किया, पार्टी को फर्श से अर्श तक पहुंचाया उसी पार्टी को अपने स्वाभिमान की खातिर दो-दो बार छोड़ना पड़ा। बाबू जी की मृत्यु के बाद पिछड़े पिछड़े चिल्लाने वाले भाजपा नेता ये कैसे भूल गए कि बाबूजी को क्यों अपनी ही पार्टी को दो दो बार छोड़ना पड़ा। क्यों मुलायम सिंह यादव से दोस्ती करनी पड़ी। जिस पार्टी के लिए उन्होंने सब कुछ किया उसे छोड़ते हुए और नई- नई पार्टी( राष्ट्रीय क्रांति पार्टी व जनक्रांति पार्टी) बनाते हुए बाबूजी के दिल पर क्या बीती होगी?
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माना कि बाबूजी पिछड़े वर्ग के नेता थे किंतु उन्हें हर वर्ग का वोट मिलता था, और बाबूजी के जाने के बाद उनके नाम से राजनीति करना कहां तक सही है? बीजेपी के जो नेता अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव को कोस रहे हैं, उन्हें एक बात तो अच्छे से समझनी चाहिए बाबू जी जब जब भी बीजेपी से गये तब तब मुलायम सिंह यादव ने उन्हें सहारा दिया, वो फिर चाहे उन दोनों की दोस्ती कह लो या फिर अपने अपने फायदे के लिए नजदीकी कह लो।
लोकसभा चुनाव 2004 में जब कल्याण सिंह बुलंदशहर लोकसभा का चुनाव लड़े थे, उस समय मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। इस चुनाव में भी मुलायम सिंह ने अपनी दोस्ती बखूबी निभाई थी यह आम जनमानस को अच्छी तरह मालूम है। जब बाबूजी ने अपने स्वाभिमान की लड़ाई में दो बार भाजपा छोड़ी तब मुलायम सिंह यादव ने ही बाबूजी को संभाला। उनके बेटे राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया को अपनी सरकार ने स्वास्थ्य मंत्री बनाया। 2009 में के एटा लोकसभा चुनाव में भी मुलायम सिंह यादव ने बाबूजी के साथ मंच साझा करते हुए रैलियां की और उनकी निर्दलीय जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
जिस भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर के कर्ता-धर्ता बाबूजी को राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन ने भी याद नहीं किया, उसी पार्टी के नेता बाबूजी की मृत्यु के बाद जातिगत बयानबाजी करके उनके कद को कम करने की कोशिश न करें तो ज्यादा अच्छा हो। जिस राम मंदिर के निर्माण की नींव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2020 में रखी थी, उसकी नींव तो बाबूजी कल्याण सिंह 6 दिसंबर 1992 को ही रख चुके थे।
सोचने वाली बात यह है जब वोट बैंक की राजनीति भाजपा कर सकती है तो अखिलेश क्यों न करें। अगर अखिलेश का वोट बैंक मुस्लिम मानते हो तो भाजपा भी तो बाबूजी के नाम के सहारे हिंदुत्व को साधना चाहती है और इसमें हर्ज भी क्या है किंतु बाबूजी के नाम पर अखिलेश के पीछे इतनी बयानबाजी क्यों. ..???
क्या अखिलेश यादव से 2022 का डर लगने लगा है? ???
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Article : Akhil Agrawal, Aurangabad Bulandshahr
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