
सभी धर्मों में यही प्रमुखता से प्रबल प्रचार है कि,सबसे पहले अपनी अध्यात्मिक उन्नति और उसकी चरम स्तर की प्राप्ति को सबसे पहले अखण्ड ब्रह्मचर्य पर विशेष बल दिया गया है,यानी जीवन मे कभी भी स्त्री या पुरुष से शारारिक सम्बन्ध नहीं बनाए और न ही स्वप्न तक मे ऐसे सम्बन्ध बनाने के विचार से स्खलित हो,तब कहीं ऐसा कम से कम 12 साल की स्थिति होने पर आप मे अखण्ड ब्रह्मचर्य ओर उसकी पवित्र शक्ति की प्राप्ति होती है।
आप सबसे पहले उदाहरणों में अपने ही धर्म के,ये धर्म कथा उदाहरणों को देखे की,सबसे पहले ब्रह्म ईश्वर से ये सृष्टि हुई और विश्व धर्म मे भी जिया ने आने से युरेनस को पैदा किया और फिर उसे ही पति बनाकर उससे आगामी मनुष्य और जीवों का संसार बनाया,ऐसे ही क्रिश्चनो में एक गॉड ने ये संसार बनाया और ऐसे ही मुस्लिमों में एक खुदा ने ये संसार बनाया,ओर
हमारे हिन्दू धर्म मे भी ऐसे ही तीन मुख्य भगवान है-ब्रह्मा-2-विष्णु-3-शिव।
ओर इन्ही तीनों के व्यक्तिगत जीवन कथाओं में अनगिनत बारों के उदाहरणों में से एक है,इनका विवाह और दिव्य रमण ओर सन्तान की उत्पत्ति हुई।जैसे
1-ब्रह्मा की सप्त व अनेक ऋषि संताने है।
2-विष्णु और लक्ष्मी से कोई सन्तान नहीं,पर उनके अवतारों राम सीता,कृष्ण रुक्मणि से संतानें है।
3-शिव पार्वती के दिव्य रमण की कथाओं के चलते,फिर पार्वती से अशोक सुंदरी,गणेश,कार्तिकेय संतान है।
ऐसी ही अनगिनत कथाएं ईश्वर और उसके अवतारों से ये सृष्टि हुई भरी पड़ी है।
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मुख्य प्रश्न यहां ये है कि-क्या कोई भी ईश्वर हो या सामान्य मनुष्य या जीव जंतु,वो बिना काम यानी सेक्स के भाव के अपने मन मे आये,कैसे नई सृष्टि कर सकता हूं?मतलब है कि जबतक की किसी भी अवतार या मनुष्य,वो स्त्री हो या पुरुष,उसके अंदर जबतक काम या सेक्स का भाव नही आएगा,तब तक वो अपने को एक्साइडिड ओर अपनी जननेन्द्रिय की उत्तेजना ओर अपने अंदर के बीज वीर्य या रज को डिस्चार्ज यानी रेचन नही कर सकता है,ओर ठीक यही सेक्स का भाव सामने वाले दूसरे स्त्री या पुरुष में ही आना और होने पर ही दूसरे के बीज वीर्य या रज के स्खलित होने पर ही ओर उसे स्त्री द्धारा अपने में अंदर ग्रहण करके उसे अपने गर्भ में पालने पर ही नई जीवन सृष्टि हो सकती है,अन्यथा किसी एक के एक्साइटिड होकर डिस्चार्ज यानी स्खलित होने से कोई फर्क नही पड़ता है,अब चाहे वो भगवान ही क्यो न हो,चलो मान ले कि किसी एक भगवान पुरुष या भगवती स्त्री को एक्सिटममेन्ट से स्खलित हुआ,तो उस बीज को किसमे वो रोपित करेगा?अपनी ही अंदर की प्रकर्ति में,तब भी वो भी उसे लेने के लिए,उस सेक्स भाव से एक्साइटिड होने चाहिए,ओर यदि वो नहीं है,तब कैसे वो प्रकर्ति उस बीज को ग्रहण करके बढ़ाएगी पैदा ओर पालेगी?अब यदि भगवान अपने ही अंदर के ऋण शक्ति ओर धन शक्ति, यानी अपने अंदर के स्त्री ओर पुरुष शक्ति को एक्साइटिड करके फिर उन्हें अलग अलग करके आपस मे सन्तान को पैदा करने के लिए प्रेरित ओर तैयार करेगा,तब भी दोनों में सेक्स का भाव ही आने पर ये सम्भव हुआ।
कुल मिलाकर कहने का अर्थ है कि,एक निष्क्रिय भाव से सृष्टि नहीं होती है,बल्कि सक्रिय भाव से ही सृष्टि होती है और उस सक्रिय भाव के लिए उसी विषय का भाव होना बड़ा आवश्यक होता है,जैसे-क्रोध के भाव से विनाश का ओर शांति के भाव से शांति का ओर प्रेम के भाव से प्रेम का,ठीक यो ही सेक्स के भाव से ही सृष्टि का।
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चलो मान ले कि भगवान ने अपने मे किसी भी काम के भाव के हम मनुष्य जीवो को पैदा कर दिया,तब हम उस भगवान की इच्छा की रचना हुए, तो हममे ये सेक्स का भाव आया कैसे?
क्योकि हमारे जन्मदाता ने तो हमे जन्मते में कोई काम यानी सेक्स का भाव नही रखा था,तो जिस भाव से हम जन्मे,वहीं हममे होना चाहिये,जो कि नही है।तब हममे भगवान के उस निष्काम का भाव ही होना चाहिए था,तब वो निष्काम का भाव तो हममें नही है?इसका किस धर्मज्ञ के पास क्या उत्तर है?
जबकि पार्वती की कुंडलिनी जाग्रत थी और बिन काम भाव के सन्तान हो ही नहीं सकती है,ओर इनकी कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र से उठकर,इनके सिर यानी सहस्त्रार चक्र पर विराजमान भी थी,जहां शक्ति के पहुँचने व स्थिर होने से काम भाव उदय ही नहीं होता है, तब कैसे आया काम भाव?
ओर यदि एक शैतान ने हमे बरगलाया है,कथित पेड़ का फल खाने से,तो भगवान ने उस शैतान में ये बरगलाए भर्मित ओर सेक्स के भाव का जन्म कैसे दिया?शैतानवाद की सेक्स थ्योरी:- क्योकि हम हो या देवता या शैतान हो या राक्षस सबके सब उस एक ईश्वर से ही पैदा या उस ईश्वर ने ही पैदा किये और बिना किसी सेक्स के भाव के,तब कैसे आया हममे ये सेक्स?
यानी ये सब बकवास थोरियाँ है।
निराकार वादी भगवान की थ्योरी ओर ब्रह्मचर्य दर्शन:-
अब आता है,ये थ्योरी की,एक निराकार भगवान है,जो भगवान या ईश्वर या गॉड है,उस निराकार अवस्था के भगवान गॉड अल्लाह में ये विचार की कैसे किया या आया कि,कोई मेरे अलावा कोई साकार स्त्री या पुरुष या ये इतने सारे अलग अलग रूप भी हो सकते है?यो ये थ्योरी बिल्कुल बकवास है।क्योंकि यदि हम निराकार से जन्मे भी है,तो हम सभी के सभी निराकार ही होने चाहिए,चलो इस विषय पर सत्यास्मि ग्रँथ पढ़ना,ओर अन्य बार सही थ्योरी बताऊंगा,यहां विषय ब्रह्मचर्य का है,तो अब सबके सब अवतारों ओर महापुरुषों को देखे,तो सबने सन्तान पैदा की है,अनेक महाशक्तिशाली ऋषियों से सन्तान,वशिष्ठ ओर विश्वामित्र की सन्तान ओर राम से लव कुश,वेदों के संकलनकर्ता वेदव्यास की धृष्टराष्ट ओर पांडु व विदुर सन्तान से करुवंश,ओर
कृष्ण से प्रद्युम्न ओर अन्य भी सन्तान हुई,ओर अर्जुन से अभिमन्यु,जेन धर्म के फाउंडर भगवान ऋषभदेव से 100 पुत्र जिनमें पुत्र
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भरत चक्रवर्ती, बाहुबली
पुत्री ब्राहमी और सुंदरी हुए और उन्ही जेन धर्म की परंपरा में स्वामी महावीर से प्रियदर्शनी,बुद्ध से राहुल,ईसा मसीह के विषय मे भी ब्रिटिश दैनिक ‘द इंडिपेंडेंट में प्रकाशित रिपोर्ट में ‘द संडे टाइम्स’ के हवाले से बताया गया है कि ब्रिटिश लाइब्रेरी में 1500 साल पुराना एक दस्तावेज मिला है जिसमें एक दावा किया गया है कि ईसा मसीह ने न सिर्फ मेरी से शादी की थी बल्कि उनके दो बच्चे भी थे।मेरी मेग्दलीन यीशु की शिष्या थी या पत्नी इस संबंध में विवाद है। यरुशलम की ओल्ड सिटी की दीवारों के बाहर लॉयन गेट के आगे इनके नाम का एक प्राचीन चर्च है। मान्यता अनुसार जब प्रभु यीशु पुन: जी उठे थे तब यही एकमात्र गवाह थी।
ओर यहूदी धर्म के फाउंडर हजरत मूसा के दो बच्चे गेर्शोम,एलीज़ेर थे,
ओर मोहम्मद साहब से फातिमा ओर कई सन्तान मर गयी थी,अब बताओ पैगम्बर की सन्तान भी जीवित नही रही,ओर गुरु नानक से श्रीचंद ओर लख्मीचंद,जो इनके खुद के सिद्धांत को नही मानकर उदासीन आदि सम्प्रदाय के अनुगामी ओर प्रचारक रहे, ओर ,कबीर के कमाल कमाली आदि आदि और जिन् ऋषियों या सन्तो ने सन्तान पैदा नही की तो,उनके पीछे तीन कारण बनते है-1-उन्होंने जीवन मे कभी सम्भोग किया ही नही,तो विवाह करके साथ रहने का अर्थ ही क्या था?जब अपने मे ही वे सम्पूर्ण थे और लिंगभेद से परे थे,किसी अन्य स्त्री या पुरुष की आवश्यकता ही नही थी,तब साथ रहकर क्या कर रहे थे?
ओर यदि सम्भोग किया, तो सन्तान हुई ही नहीं या की ही नही?तो प्रश्न बनता है कि,जो अपने संकल्प से ओरो के सन्तान पैदा कर सकते थे,उनके खुद के सन्तान नही हो ये सम्भव ही नही है।और तीसरा प्रश्न है कि,उन्होंने सम्भोग किया और सन्तान नही की,तो फिर केवल व्यक्तिगत एन्जॉय का क्या अर्थ है?परस्पर काम ऊर्जा कि प्राप्ति करना और अपना काम भाव का निस्तारण यानी खत्म करते हुए ध्यान बढ़ाना।
तो कुल मिलाकर समझने वाली बात यहां ये है कि,इन सब अवतारों की आध्यात्मिक शक्ति कुंडलिनी बचपन से या गुरु से बालक उम्र में जाग्रत होने पर भी कैसे मूलाधार चक्र से ऊर्जा सहस्त्रार चक्र तक पहुँचने पर काम का भाव आया,जिससे उन्होंने सम्भोग किया?और सन्तान पैदा की।ओर उनकी आध्यात्मिक शक्ति कुंडलिनी भी जाग्रत रही और उन्होंने बहुत चमत्कार किये।
अब विषय आता है,ब्रह्मचारी सिद्धों का-
1-हनुमान जी:-अब अखण्ड ब्रह्मचर्य के विश्व प्रसिद्ध उदाहरण में हनुमान जी आते है,तो हनुमान जी खुद शिव जी के ग्यारहवे अंश थे और इनका जन्म भी काम भाव से हुआ था,जिसमे सबसे पहले शिव जी ने विष्णु जी से उनके मोहनी रूप को देखने इच्छा करी ओर उस मोहनी रूप को देख कर उसे अलिंगन में करते में विकट काम भाव से स्खलित हुए,जिसे वायु देव ने शापित अप्सरा के वानर रूप अंजनी के गर्भ में पहुँचाया था,यो केसरी के साथ साथ वायुदेव यानी पवनसुत इनके जन्म पिता भी रहे।यो ये बाहरी तोर पर ब्रह्मचारी दिखते थे,पर ये शिव विष्णु के काम भाव से जन्मे ओर अंजनी केसरी के काम भाव से जन्मे थे,तब इनमें शिव का अकेला सेवक रूप राम की भक्ति में दिखते हुए भी,इन्हों से सूर्य से ज्ञान लेने पर उनकी तपस्वी पुत्री सुवर्चला से विवाह किया,जिसका मन्दिर भी है।और इनसे मछली से पुत्र मकरध्वज भी हुआ।तब इनमे इनके ब्रह्मचारी होंने से महाबल नही था,बल्कि इनके शिव अवतार के होने से स्वाभविक महाबल था।
2-भीष्म का उदाहरण है,तो जानो पहले ये अष्ट वसु में से एक थे और इनका पहले कोई उद्धेश्य ब्रह्मचारी बने रहने का नही था और पिता शांतनु ओर सत्यवती के विवाह को कराने को इन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत का संकल्प किया,ओर यहां असल सत्य और उसकी शक्ति देखे,की शांतनु जो पहले गंगा से 8 पुत्र पैदा किये,मतलब गंगा जैसी महाशक्ति से सम्भोग करने की शक्ति रखता हो और फिर सत्यवती,जो पराशर ऋषि के साथ दिव्य रमण यानी दिव्य सम्भोग करके मत्स्यगंधा से योजनगंधा हुई पर आसक्त हो गए,ओर ऐसे काम भाव के मारे मनुष्य ने अपने लड़के के ब्रह्मचारी रहने के वचन पर प्रसन्न होकर इच्छा म्रत्यु का वरदान दिया,जो ब्रह्म विष्णु महेश भी नही दे पाए,तो सिद्धि किसकी बड़ी एक भीष्म की या शांतनु की,यानी एक कामनायुक्त कामासक्त गृहस्थी शांतनु की संकल्प शक्ति बड़ी थी।भीष्म केवल उस वरदान को झेलने की शक्ति मिली और वही उसके लिए शाप बना।
ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है:-ब्रह्म का आचरण यानी जिस प्रकार हमे हमारे ब्रह्म ने उत्पन्न किया है,उसके उद्धेश्य कारणों को जानकर उस ज्ञान शिक्षा को जानकर उस नियम को आगे चलकर प्रक्टिकल यानी प्रयोग रूप में अपनाना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है।
वीर्य या रज को रोकना उसे उर्ध्वगामी बनाने का सत्य ओर अविवाहित रहने का ओर आयुर्वेद का कथित सिद्धांत का खंडन एक सहज उदाहरण एक वेश्या महीने में कम से कम 15 अलग अलग व्यक्तियों से 15 बार सम्भोग करती है,तब उसका महीने में कम से कम 15 स्खलित होने पर, आयुर्वेद के वीर्य रज बनने के कथित ब्रह्मचर्य सिद्धांत के अनुसार 15 या 40 दिन में वीर्य या रज बनता है,तो इतनी जल्दी वीर्य या रज बनना ही नहीं चाहिए?तब कैसे बनता ओर वो कैसे 15 बार अलग अलग व्यक्तियों के साथ 15 बार डिस्चार्ज होकर अपने सहित दूसरे को सेक्स में आनन्द देती है?तब तो आयुर्वेद के 40 दिन में वीर्य या रज बनता है।इस सहित ओर भी अनेक कथित ब्रह्मचर्य वाद के कथित सिद्धांतो का असल सत्य अगले वीडियो सत्संग भाग-2, में बताऊंगा।
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