सुदीर्घ बाहु बल संज्ञान युक्त
केवल्य मुक्त आत्ममय ज्ञान।
ऋषभदेव ईश्वत संतति
अतुल्य भारत बाहुबली महान।।
ऋषभदेव राज्य त्याग कर
प्राप्त करने चले केवलीज्ञान।
दे गए ज्येष्ठ पुत्र भरत को
अयोध्या सिंहासन किरीट और मान।।
बहुत काल उपरांत में
मिले तीन समाचार।
ऋषभदेव केवलीज्ञान प्राप्त
प्रकट रत्नचक्र और पुत्र जन्मसार।।
प्रथम पिता दर्शन किये
और दूजे किया राज्य विस्तार।
रत्नचक्र चला अग्रिम हो
मिली विश्वविजय उपहार।।
लौटे महाराज भरत तब
कर छः विश्व खंड विजय।
लोट राज्य में मुख्य द्धार आ
रत्नचक्र स्थिर हुआ अजय।।
ये देख भरत विचारित हुए
कौन विरोधी मेरे मान।
भाई शेष रह गए विजय
उन्हें भेजा निज शरण लेने का ज्ञान।।
अट्ठानवें भाइयों चले गए
बन पिता ऋषभदेव के शिष्य।
और एक भाई थे बाहुबली
उन्होंने युद्ध स्वीकारा विपरीती शिष्य।।
भीषण रक्तपात त्याग
करें परस्पर युद्ध।
हुया दोनों में तीन तरहां
द्रष्टि जल मल्ल युद्ध।।
एक दूजे अपलक देखते
यहाँ हारे भरत महाराज।
एक दूजे जल को फेंकते
वहाँ विजय बाहुबली युद्ध इस काज।।
मल्लयुद्ध में भी बाहुबली
सहज गए थे जीत।
उठा पटकते भरत को
पर स्मरण आया इस विजित।।
भरत मेरे बड़े भाई है
उनका किया ये अपमान।
भरे ग्लानि इस कृत्य से
उन्हें बेठा दिया सिंहासन दे मान।।
बाहुबली के इस कृत्य से
प्रसन्न जनता हुयी इस बात।
पर भरत ने इसे अपमान समझ
चला दिया रत्नचक्र घात।।
बाहुबली की परिक्रमा कर
रत्नचक्र हुआ वही स्थिर।
इस कर्म भरत अपमानित हुए
और बाहुबली वेराग्य चढ़ा हो स्थिर।।
तब छमा मांगते कहते है
हे-छमा करो भरत भाई।
संग भरत भी भरे पश्चाताप से
जेनेश्वरी दीक्षा लेने चले बाहुबली अथाई।।
पिता से दिगम्बरी दीक्षा ले
एक वर्ष किया उपवास।
निश्चल स्थिर खड़े आसन रह
किया अपलक ध्यान आत्मवास।।
चढ़ गयी लताएँ शरीर पर
बनाई बॉबी दीमक सर्प।
हिंसा वृति त्याग पशु
अहिंसक बने त्याग सब दर्प।।
कर्म कृत्य सब लुप्त हुए
यूँ स्थिर है भुजलम्ब।
अन्तःकरण दर्शित त्रिकाल
मन तन भ्रमण त्याग स्थिर स्तम्भ।।
इस तप को देख सब देव भी
पूजन कर कमाए पूण्य लाभ।
ठीक तप वर्ष समाप्ति आय कर
भरतेश्वर ने पूजन किया तप्ताभ।।
तभी प्रकट हुआ केवलज्ञान
आत्मप्रकाशीत हुआ आत्मलोक।
इस अनुभव विचार बाहुबली
भरत के मन था कृत्य उस शोक।।
यूँ ही देर हुयी इस महाज्ञान में
भरत का पूजन था मुझ शेष।
पूर्ण की नही कोई इच्छा और
स्थिर हुए विकल्प संकल्प अशेष।।
इस धरा धर्म जगत में
बाहुबली प्रथम पाये मोक्ष।
भगवान कहलाये महतपि बन
असंख्य जन जीव दिए स्वमोक्ष।।
भगवान बाहुबली तप स्मरण में
बनवायी विशाल अखंड प्रतिमा।
समयानुसार अलोप हुयी
महाराज भरत निर्मित पन्ना प्रतिमा।।
हजार वर्ष के उपरांत में
राज्यमंत्री हुए गंगवँशी चामुंडराय।
बाहुबली दर्शन हेतु कई वर्ष से
इनकी माता दूध त्याग तपाय।।
ये ज्ञान जान ये चल दिए
श्रवणबेलगोल किया पड़ाव।
इसी चिंतन देवी वष्माण्डिनी का
निर्देश हुआ गुरु नेमीचंद उपाव।।
तब बनवायी चामुंडाराय ने
सत्तावन फिट ऊँची दिव्य प्रतिमा।
981 ईस्वी गोम्मटेश में
प्राणप्रतिष्ठित बाहुबली अखंड प्रतिमा।।
बाहुबली वर्णित सत्यास्मि योग:-
बाहुबली का आत्मयोग
सीधा सहज सरल।
अपनी आत्मा ध्यान करो
स्वरूप ध्याओ अचल।।
स्वयं की उपस्थिति अनुभव करो
और मैं हूँ का कर भान।
इसी ध्यान में स्थिर रहो
जबतक ना होवे आत्मज्ञान।।
मैं ही सनातन सत्य हूँ
और मैं ही वक्ता मोन।
बिन कुछ बोले अन्तः स्थिर रहो
केवल ध्यायो मैं हूँ कौन।।
तब स्वयं द्रश्य मिट जायेंगे
जो स्वयं से सदैव है जन्में।
देखते रहो सब होता हुआ
निर्लिप्त रहो मन से मन में।।
यो ही विचार होंगे समाप्त
और बन जाओगे निर्विचार।
सच्चा प्रकट मोन हो
और सत्य का हो आत्मसाक्षात्कार।।
तब बिन कहे सत्य का घोष हो
और प्रकट प्रकाशित नाँद।
गुंजित हो स्वयं ऊँकार
अहम् सत्यास्मि अहं रहित अनाँद।।
नही कोई और जीव जगत
सभी और हूँ मैं।
मैं ही प्रश्न उत्तर करता हूँ
और इष्ट साधक इष्ट हूँ मैं।।
स्वयं में स्थिर स्थित हूँ
तब मैं नमः नाहम नाही।
स्वयं अपूर्ण से सम्पूर्ण मैं
यो सिद्ध से सिद्धायै मैं अथाई।।
तब सत्य मैं ॐ मैं
और मैं ही सिद्धायै सर्व समय।
यो आत्मघोष हो इस सिद्धमंत्र
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः।।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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