सत्यास्मि पूर्णिमा योग-इस विषय में अनुभव सिद्ध ज्ञान बता रहें है – स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी…
सनातन धर्म में अध्यात्म के तीन भाग है-1-यंत्र-2-तंत्र-3-मंत्र।
यंत्र शरीर को कहते है। शरीर में जो सोलह शक्ति केंद्र है। उनको जाग्रत करने का नाम यंत्र शुद्धि या अंग न्यास कहलाता है। इससे त्रिशक्तियों में प्रथम ब्रह्म शक्ति पर अधिकार होता है। जिसे बहिर प्रकर्ति योग की सोलह शक्ति कलाओं के अंतर्गत बावन से छप्पन वर्णाक्षर यानि भैरव भैरवी की सिद्धि कहते है। और तंत्र का तन यानि शरीर में जो प्राण शक्ति है, उसके जितने भी मुख्य अणु यानि तन्मात्राएँ है। जिन्हें चोसठ अणु और परमाणु के रूप में क्रिया और प्रतिक्रिया स्वरूप माना है। इनका शोधन ही तंत्र का मुख्य साधना है। इससे त्रिशक्ति की द्धितीय अंतर ब्रह्माण्ड शक्ति या विश्व शक्ति या अंतर प्रकर्ति की शक्तियों पर अधिकार होता है। इसी का पंथों के अनुसार महाविष्णु और उनके 12 या 24 अवतारो की उपासना सिद्धि कही है, और यही देवी की 108 शक्ति पीठों की साधना सिद्धि कही है। और मंत्र में मन की मुख्यतया दो भाग है-1- शाश्वत ज्ञान अर्थात स्थिर ज्ञान और दूसरा-2- क्रियात्मक ज्ञान अर्थात प्रयोगात्मक से पता करना की शाश्वत सत्य है और इसके 84 विभाग है। यो मन के चौरासी विभागों का नाम ही 84 योनिया कहा जाता है। ये सब मिलकर ही सम्पूर्णता की प्राप्ति का नाम आत्मा से परमात्मा कहलाता है। मंत्र विज्ञानं से त्रितत्वों की अंतिम तृतीय सिद्धि विज्ञानं और ज्ञान योग के साकार रूप शिव शक्ति योग की सिद्धि होती है। यो इन यंत्र और तंत्र और मंत्र का सम्मलित अभ्यास के कर्म का नाम भोग है। और कर्म के उपयोग का नाम योग है।यही त्रितत्व ज्ञान गुरु से विधिवत शक्तिपात दीक्षा के अनुसार श्रद्धा पूर्वक समर्पित भाव से प्राप्त करना चाहिए।इन्ही का नाम सरलीकरण योग या पूर्णिमा योग कहलाता है।
1-यंत्र विज्ञानं:-
हमारे शरीर में अंगूठे से सिर तक सोलह शक्ति केंद्र है-जिनके नाम इस प्रकार से है-
1-काल शक्ति केंद्र पैर के अंगूठे व् हाथ के अंगूठे के अग्रभाग में होता है।इसकी देवी शक्ति अरुणी हैं।
2- पैर के तलुए और हथेली के मध्य भाग में होता है।इसकी देवी शक्ति यज्ञई है।
3- ये कलाई और कोहनी के मध्यभाग में व् पिंडली के प्रारम्भ में होता है।इसकी देवी शक्ति तरुणी हैं।
4- ये जांघ के नीचे और मध्य भाग में व् बाह में कोहनी से ऊपर व् कन्धे से नीचे मध्यभाग में होता है।इसकी देवी शक्ति उरूवा हैं।
5- ये कन्धे और गर्दन के बीच में और मनुष्य के बैठने के स्थान पर उसके नितम्बों के मध्य में होता है।इसकी देवी शक्ति मनीषा हैं।
6-दोनों गर्दन के दोनों और जहाँ इनके बीच स्वास् की नली होती है और ये नितम्बों के अंत में कमर के पीछे से दोनों जांघो के मिलन स्थल पर होता है।इसकी देवी शक्ति सिद्धा हैं।
7- ये शक्ति केंद्र है। यह शारारिक ऊर्जा और जैविक विद्युत का भण्डार है। यही मूलाधार चक्र भी है। इसके जरा सा भी असंतुलित होने पर स्त्रियों को पीरिएड और योन रोगों की समस्या से लेकर संतान उतपत्ति में बाँधा होती है। तथा पुरुषों में मधुमेह व् पुरुष जनित रोगों की व् अल्पायु योग बनता है।इसकी चिकित्सा हेतु पृथ्वीतत्व का ध्यान करना चाहिए।इसकी अधिष्ठाता देवी इतिमा देवी शक्ति है।
8-ये अवचेतन मन का स्थान होता है। इसका प्रभाव व्यक्ति में इच्छा शक्ति का आभाव या अधिकता बनती है। यही पराक्रम का स्थान है। जिन्हें मनोरोग डिप्रेशन रहता है। सदा शरीर थका गिरा सा निर्बल सा अनुभव होता है। उन्हें इसी चक्र में जल तत्व के ध्यान से बल मिलेगा यही स्वाधिष्ठान चक्र भी है।इसकी देवी शक्ति दानेशी हैं ।
9-ये तेजस्व केंद्र है। और इसका सम्बन्ध गुर्दे लिवर यानि पेट के ये सभी भागों से है। इसी के असन्तुलित होने से व्यक्ति में निर्लज्जता,ईर्ष्या,सुषुप्ति,मोह,अज्ञात भय की व्रद्धि होती है। जिनमे घोर आलस्य बना रहता है। जिसे पशुवत भाव कहते है। वो यही से नियंत्रित होता है। यो यहाँ अग्नि तत्व यानि एक ज्योति है। उसका ध्यान करने ये सब ठीक होता है। ये नाभि चक्र है।इसकी देवी शक्ति धरणी हैं।
10-ये आनन्द केंद्र है। इसके अनावश्यक प्राणायाम या ऐसी ही किसी व्यायाम प्रणाली या उछल कूद के करने से असंतुलित होने से निराशा का भाव, कुछ भी प्रयास करने को मन नही करना,कठोरता, कपट,विवेकहीनता,लोलुपता,शराब पीना सभी नशे आदि की सभी बुरी गन्दी आदते यही से बनती और नियंत्रित होती है। यो यहाँ गुरु इष्ट मंत्र का व् किसी भी शुभ भाव को बनाकर ध्यान करने से यहाँ ऊर्जा एकत्र होती है। और सब ठीक हो जाता है। अनुलोम विलोम प्राणायाम भी उत्तम है। ये ही ह्रदय चक्र है। यही इष्ट शक्ति के दर्शन होते है।इसके देवी शक्ति अज्ञेयी हैं।
11-ये मन के दोनों भागों का नियंत्रित करता शारारिक चक्र केंद्र है। इसके असन्तुलित होने से कंठ के रोग और सभी प्रकार की शिक्षा विद्या में विघ्न बाँधा का आना और अपूर्ण शिक्षा व् नोकरी में देरी और प्रमोशन का नही होना और गुप्त व् प्रत्यक्ष विरोधियों की वृद्धि होनी लिया दिया धन की वापसी नही होनी आदि प्रकोप मिलते है। ये कण्ठ चक्र है। यो यहाँ गुरु मंत्र का जप ध्यान करने से इन सभी विपदाओं से मुक्ति मिलती है।इसकी देवी शक्ति यशेषी हैं।
12-ये ब्रह्म केंद्र है। यहाँ जीभ का अग्र भाग मध्य भाग व् अंतिम भाग में शक्ति बिंदु होते है। जिनका सीधा सम्बन्ध हमारी जनेंद्रिय से और ह्रदय की गति से और सभी प्रकार के कफ,वात,पित यानि त्रिदोषों से सीधा सम्बन्ध है। उनकी विकृति को यही से सही किया जाता है। ये तालु चक्र है। यो जीभ को ऊपर के तालु में स्पर्श किये बिना केवल जीभ खड़ी ही रखनी है। तब ये मुद्रा तालव्य योग मुद्रा कहलाती है। इसे खेचरी मुद्रा भी कहते है। यहाँ मंत्र के साथ ध्यान करने पर सभी अद्रश्य रूप और अरूप प्रकाशित दर्शन होते है। और सही ब्रह्मचर्य व् सही ग्रहस्थ का पालन होता है।इसकी देवी शक्ति ऐकली हैं।
13-ये दर्शन केंद्र है और आज्ञा चक्र है। यहाँ त्रिनाड़ियों का संगम है। यहाँ गुरु मंत्र के साथ भावना शक्ति के प्रवाह के अनुभव करते रहने से कुंडलिनी की उर्ध्व से ह्रदय की और गति जागर्ति होती है। जिससे साधक को प्रत्यक्ष मंत्र देव देवी या निराकार तत्व के दर्शन होते है। ज्योति का उदय होता है। उसमे जो बिंदु जो शुक्र के तारे जैसा होता है। उसकी प्राप्ति पर ही त्रिकालज्ञ होने की शक्ति प्राप्त होती है।इसकी देवी शक्ति नवेषी हैं।
14-ये ज्योतिर्लिंग स्वरूपी ज्ञान गुरु पद की प्राप्ति होती है। और स्वयं की आत्म अनुभूति का प्रज्ञा चक्र है।इसकी देवी शक्ति मद्यई हैं।
15-ये सहत्रार चक्र है। यहाँ ध्यान का अभ्यास या समाधि की स्थिति होने पर ही स्थित हुआ जाता है। सामान्य ध्यान का यहाँ विषय नही है। यहाँ शक्ति के प्रवाहित होने पर और उसकी स्थिरता के होने पर यहीं 84 लाख न्यूरॉन की जागर्ति होती है। यही 84 लाख या अधिक न्यूरॉन ही मनुष्य की 84 लाख योनियाँ है। ठीक यही पर वे सब पूर्वत जन्म और वर्तमान व् भविष्य के जन्मों के कर्म संस्कार स्थापित रहते है। जब शक्ति का पूर्ण प्रवाह इस सहत्रों कलियों से एक प्याज की शक्ल का एक पर्त दर पर्त लम्बकार ऊपर की और को उन्मुख हो कर खिलने वाला कमल की संज्ञा वाला चक्र होता है। इसमें सामान्य तौर पर भी गुरु मंत्र से जप ध्यान करने से मष्तिष्क के रोग सही होते है। और ज्योति और आलोक के दर्शन होते हुए चित्तकाश में स्थिरता की प्राप्ति होती है। यही समस्त 84 लाख से ज्यादा मनुष्य जीव जगत की योनियाँ जन्मों का ज्ञान होता है।इसकी देवी शक्ति हंसी हैं।
16-ये प्रेमोक्ष चक्र है। यहाँ पर निर्विकल्प समाधि के उपरांत स्वयं में सम्पूर्ण स्थिति की प्राप्ति होने पर समस्त स्व्यंभू जन्म मरण बिन गर्भधारण के जन्म की सामर्थ्य की प्राप्ति होती है। यही पूर्वत महावतार की अनन्त अवतार श्रंखला 12 हो या 24 हो या अनन्त हो उनका सम्पूर्ण रहस्य का ज्ञान और सामर्थ्य की प्राप्ति होती है। और महारास अर्थात सभी अवस्था में जितने भी प्रकार के आनन्द और उनके कारण है। वे बिना स्खलन और पतन के अधिकार सहित महानन्द में स्थिति प्राप्त होती है।
और भी अनेक छोटे बड़े शक्ति केंद्र शरीर में स्थित है। जैसे कान ये स्थान साधक को संयम् की कला के विकास से स्वयं प्राप्त होते है। इनसे अनेक छोटी बड़ी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। कान और आकाश तत्व के सम्बन्ध में ध्यान करने पर दूरश्रवण की शक्ति प्राप्त होती है आदि आदि।।इसकी देवी शक्ति सत्यई पूर्णिमां हैं।
2-तंत्र-इन सभी सोलह चक्रों में एक एक करके अपनी प्राणशक्ति का विधिवत प्रवाह करने की रेहि क्रिया योग कला गुरु से सीखे। जिसे प्राणायाम विधि भी कहते है।
3-मंत्र- अपने सिद्धासिद्ध महामंत्र-सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा”” का इन सभी सोलह शक्ति केंद्रों में मन की शक्ति का प्रवाह करते हुए अनुलोम और विलोम जप ध्यान विधिवत करना चाहिए।
तब आपकी आत्मा जो सम्पूर्ण शरीर स्वरूप है। मंथ कर अपनी परमावस्था में उसी प्रकार से प्रकाशित और उजागर होती है। जैसे की इन तीन स्तरों की प्रक्रियाओं के माध्यम से यानि क्रिया योग से कच्चे दूध से जमा कर दही और दही को बिलों कर मख्खन और अंत में तप्त करके घी की प्राप्ति की जाती है।
ठीक तब मनुष्य को आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति होती है। और वो अहम् सत्यास्मि की पूर्णिमा को प्राप्त होता है।।
इस पर सत्यास्मि योग कविता हैं-
यंत्र कहे शरीर को
जिसमें नो त्रिकोणी योग।
तंत्र कहे प्राण तन्मात्रा
जिसमे दस प्राण शक्ति का संयोग।।
मंत्र कहे मन शरीर को
जिससे सूक्ष्म शरीर हो प्राप्त।
सोलह शक्ति चक्र में
गुरु मंत्र ध्यान करो व्याप्त।।
यहाँ आठ चक्र है पुरुष के
और आठ चक्र है नार।
दोनों मिल सोलह कला
भोग योग पूर्णिमाँ सार।।
ज्यों दूध दही मख्खन बिले
और मिले अंत में घी।
यही पूर्णिमा योग विधि
जिसके करे प्राप्त आत्म धी।।
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स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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