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क्या है कायाभेदी वाणी का रहस्य? क्या है इसका धार्मिक महत्व, जानिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से

 

 

 

 

क्या है कायाभेदी वाणी का रहस्य? कहाँ से आया यह शब्द? क्या है इस शब्द का धार्मिक महत्व? इन सब सवालों के जबाव दे रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

कायाभेदी वाणी रहस्य- इस योगविषयक परमज्ञान को भक्तों के लिए स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी बता रहे हैं…

कायाभेदी वाणी साधना जगत की एक ऐसी उच्चतम अवस्था है। जिसमें सभी उन सिद्धों का प्रवेश विशेष होता है। जो इन तीन गुरु शक्तिपात अवस्था में प्रवेश कर गए हो।तब उन्होंने जो भी गुरु मंत्र धर्म दर्शन का अध्ययन किया है और उसका आत्म मनन किया है और उसका सार निष्कर्ष समझा है। ठीक वही इस अवस्था में उन्हें अपनी आत्मा के आत्मव्योम के आत्म प्रकाश में प्रत्यक्ष जीवन्त दर्शन के साथ सुनाई आता है। जिसे प्रारम्भिक अवस्था में केवल वही देख और सुन सकते है। और जब ये सब दर्शन और वाणी उन्हें अंतर जगत से बहिर आत्मजगत में दर्शित होने लगती है तब उनसे जो भी भक्त शिष्य संयुक्त होता है। यानि उसका और इनका मन से उर्ध्व आत्म मेल होने लगा है उसे भी ठीक यही सुनाई और दिखाई देने लगते है। ऐसी अवस्था में उस साधक अवस्था से ऊपर मनोजगत सिद्धावस्था में ही ये सब दर्शन होते है। यहाँ भक्त का इष्ट और उसके मंत्र और मंत्र के समस्त भावार्थों का दर्शन मात्र है। यही अनेक भक्त इष्ट की स्तुति में स्त्रोत्रपाठ का स्वयंभूत उच्चारण करते है आध्यात्मिक कवित्त्व प्रकट होता है। परन्तु इस अवस्था में भी उस स्त्रोत्रपाठ,कवित्त्व आदि में केवल उस इष्ट की प्रसंसा और इसके दर्शनों की ही अभिव्यक्ति मात्र होती है। ये इति उच्चतम होते हुए भी पूर्ण नही है। क्योंकि यहाँ इष्ट या गुरु मंत्र के भावार्थ के ज्ञान दर्शन ही कहे और उच्चारित और लिखे जाते है। ये वो मनोसिद्धावस्था की अवस्था है जहाँ अब तक के जितने भी भक्ति प्रधान धर्म ग्रन्थ लिखे है। जिन्हें ईश्वर की वाणी कह कर प्रचारित किया गया है और प्राचीन के ही रूपांतरण नवीन इष्ट मंत्रों की सृष्टि जनकल्याण को होती है। ये वही अवस्था है। इसे ही “कायाभेदी वाणी” अवस्था कहते है। ये मन में आत्मशक्ति के प्रवेश होने से प्राप्त मन की शक्ति माया बन कर जो भी समस्त अलौकिक सिद्धि है। दूरदर्शन,अद्रश्य,वायुगमन आदि आदि उनसे ऊपर का योग अवस्था है। ठीक यहीं अनगिनत ऋषियों ब्रह्मर्षियों को इस आत्म अवस्था में कायाभेद वाणी सिद्धि की प्राप्ति हुयी उसी में वेद ऋचाएं देखी और लिखी गयी है। जैसे ब्रह्मर्षि छत्रिय गुरु से “विश्वब्रह्म महागुरु विश्वामित्र” को “वेदमाता गायत्री” का प्रत्यक्ष श्रवण दर्शन हुआ और इसी से आगे वे सिद्धि प्राप्त कर आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति कर स्वयंभू ब्रह्मर्षिगुरु पद को प्राप्त हुए, तभी वशिष्ठ ने स्वयं आकर इन्हें ह्रदय से गले लगते हुए ब्रह्मर्षि माना यहां स्मरण रहे जो ये कहते है की इन्हें वशिष्ठ ने ब्रह्मर्षि की पदवी या मन्यता दो वो पूर्णतया भर्मित है। इस अवस्था में स्वयंभू आत्मसाक्षात्कार आयत होने से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त और उपलब्ध ब्रह्मत्त्व को प्राप्त मनुष्य एक ही आत्मलीन अवस्था का अनुभव करते है। तब कोई भेद नही रहता है। इसे ही अन्यों ब्रह्मर्षियों से अनुमोदित एक्त्त्व की स्वीकर्ति कहते है। जो विश्वामित्र व् वशिष्ठ के मध्य घटित हुयी और जितने भी समय समय पर योगी होते आये उन्होने जो अपने आत्म संकल्प में जो मंत्र देखा वही अपने शिष्यों को दिया और वही दिया मंत्र एक दूसरे से प्रत्क्षय प्रदानता से ही जरा से उच्चारण से सिद्धि देता है। अपने आप लिए या पुस्तक से लिए कितने भी चमत्कारी व्याख्या की गयी हो वो विफलता को ही प्राप्त होते है। अन्यथा बाल्मीकि और हनुमान जी के एक बार श्री राम कहते है। मनोकामना पूर्ण होती थी। और आप करोड़ों श्री राम या सीता राम या श्री कृष्ण राधे जपने से यथा स्थिति को ही प्राप्त रहते हो। यही है सदगुरु से प्राप्त महामंत्र की प्रत्यक्ष प्राप्ति में भेद यो शीघ्र गुरु से प्रत्क्षय गुरु मंत्र लेना चाहिए और वर्तमान में 18 वीं से 19 वीं सदी के मध्य जन्मी अनेक साधक से सिद्ध स्त्रियों को भी ये कायाभेद वाणी की सिद्धि प्रत्यक्ष हुयी है ।उनके शिष्यों ने उनकी संगत में उनकी देह अंगो पर अनेक दिव्य मंत्रों को प्रत्यक्ष देखा। उन्हें लिखा परन्तु वे आज उन शिष्यों की लिखी उन गुरु की चरित्रावली में स्पष्ट दिए होने पर भी फलीभूत नही हुए है क्योकि वे गुरु सहित उन्हें ही दर्शित हुए है। उन्हें संसार के परकर्तिक मण्डल में अपनी क्रिया करने का अधिकार नही मिला है। यो वे सिद्ध होते हुए भी असफल है।
ऐसी एक सिद्धि रही काशी की “श्री श्री सिद्धिमाता”(ब्रह्मलीन 26/4/1943) जो काशी में ही पूर्वजन्मों के भक्ति कर्म प्रधानता से सिद्ध हुयी उनके शरीर का आसरा श्रीकृष्ण ठाकुर लेकर ये सब दिखाते थे। तब उनके शरीर पर ऐसे ही प्रत्यक्ष “दिव्य मंत्र” दीखते थे यहाँ तक अति दुर्लभ “विष्णु पद” भी प्रकट हुए। उन्होने अपने एकाद शिष्य को दिए वे शिष्य भी साधक हो रहे सिद्ध नही हुए आगामी जन्मों की साधना यात्रा में अग्रसर होंने की और गतिशील है। यहां भी पुरुषवादी शक्तिदान के दर्शन है और ऐसी ही “श्री माँ शारदा मणि” श्री रामकृष्ण परमहंस की अर्द्धांग्नि थी उन्होंने अनगिनत को मंत्र दीक्षा दी, तब दीक्षा का अधिकार उन्हें श्री रामकृष्णदेव से ही सुक्ष्मशरीर के एक्त्त्व से मिलता था। यो यहाँ भी पुरुषवाद की ही सिद्धि दिखाई देती है और जो वतर्मान है। स्त्री गुरु है भी वे भी पुरुषवादी शक्तिपात से चैतन्य है। यो उनकी दीक्षा में अभौतिक जगत को भेदने की वो सामर्थ्य नही है और जो स्वयंसिद्धा स्त्री गुरु है।वे भी पूर्वजन्म की ऐसी ही पुरुषवादी शक्तिपात से इस और आगामी आध्यात्मिक यात्रा पर अग्रसर है। अन्यथा उनके शिष्यों में उच्चतम आत्मजगर्ति दिखाई देती। क्योकि अभी स्त्री स्वयं के आत्मबल से सिद्ध नही हुयी है। अभी उसका स्त्री युग का प्रथम चरण का प्रारम्भ हुआ है। वो पुरुषयुगों से गुजरती हुयी अपने स्त्रियुग में प्रवेश कर रही है। अभी उसे पूर्णतया सिद्ध होने में समय लगेगा उसे अपनी कुण्डलिनी ढूंढनी होगी अभी वो पुरुष की कुण्डलिनी के सहयोग से ये सब दर्शन प्राप्त कर रही है। तब जब वो अपनी स्वयं की कुंडलिनी को खोज लेगी और उसे अपने बल से जाग्रत करेगी और फिर वो अपनी ही विश्व कुण्डलिनी को जाग्रत करेगी तब कहीं जाकर उसे सम्पूर्णत्त्व की प्राप्ति होगी ये स्त्री की अपूर्णता पर आलोचना नही समझें ।इसे स्त्री अपनी यथार्थ कुंडलिनी योग की खोज और उसे सिद्धहस्त करने की दिशा में कहा गया है। जो की सत्यास्मि मिशन कर रहा है।
पूर्व से कथन आगे की ये सम्पूर्ण मनो जगत में प्रवेश करके वहाँ से आत्म जगत के बाहरी क्षेत्र है। इसे ब्रह्मक्षेत्र या ब्रह्म साक्षात्कार की स्थिति भी कहते है इससे आगे जब भक्तिसिद्ध होकर स्वयं की आत्मसिद्धि के क्षेत्र में प्रवेश करता है। तब उसमें मंत्र और उसके सम्पूर्ण भावार्थ और इस मंत्रोभावार्थ का भी प्रत्यक्ष आत्मदर्शन की स्वयं में ही अनुभूति होती है केवल अनुभूति ही होती है। उसमें अधिकार नही होता है। यहाँ सिद्ध को आत्मसाक्षात्कार में सब एक मैं ही हूँ की दर्शन के साथ अनुभूति होती है। इससे आगे वो स्वयंभू गुरु बनता है। इसे इस उदाहरण से समझ सकते है। की मानो आप तैराकी की प्रतियोगिता में भाग लेते है। तब आप सब तैराकों के साथ साथ एक तैराकी के अनुभव व्यक्तियों की जिन्हें गुरु कोच कहते है। वह नाव आपके तैरते हुए साथ साथ चलती है की यदि कोई तैराक बीच तैराकी प्रतियोगिता में थक जाये और वो तैरने से मना करने लगे तो उसे उस जल के मध्य भाग में डूबने से नाव पर चढ़ा कर बचा लेते है। यही आध्यात्मिक साधना के संसार में गुरु की शिष्य के साथ साथ भवसागर में धर्म यात्रा होती है ज्यों ही शिष्य साधना के भवसागर में थक जाता है। वो उस समाधि में चैतन्यता को खोने लगता है मूर्छित होने लगता है। ठीक तभी गुरु उसे अपनी आत्म नाव में चढ़ा लेते है।उसे उस मूर्छा से बाहर निकाल लाते है। उसे फिर से तैयारी करने को कहते है और जबतक साथ रहते है,की जबतक शिष्य उस भवसागर की तैराकी स्वयं आत्म प्रतियोगिता में पार नही हो जाता है, और इसके बाद एक और स्थिति आती है की- शिष्य को उस आध्यात्मिक आत्म प्रतियोगिता में प्रथम से लेकर सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होना पड़ता है।जन्मों लग जाते है। इस कला में सिद्ध होने में और अंत में दो और सिद्ध अवस्थाओं को स्वयं ही बिना गुरु के पार करना होता है। की एक बार स्वयं ही बिना किसी बाहरी साहयता के नितांत एकांत में इस अनंत आत्मभवसागर को पार करते हुए पुनः वापस आना पड़ता है। और अंत में अनेक बार इधर से उधर पार करते हुए सिद्ध होकर निर्भयता की परिपूर्णता सिद्ध करनी होती है।तब स्वयं को सिद्धासिद्ध आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है। अब वो स्वयंभू गुरु बनकर जन्मते है। अपने स्वयंभू जन्म में पूर्वजन्तित आत्मसाक्षात्कार को केवल मनुष्यकृत योनि से जन्म लेने से जो आत्मविस्मर्ति का प्रकर्ति दोष मेलदोष आता है। उसे स्वं आत्मसाधना से धोते है। यही उनकी जन्मसाधन कहलाती है। तब वे अनगिनत शिष्यों को अपने आत्मबल से पूर्ण सिद्ध बनाने में तत्काल साहयक सिद्ध होते है। इसके बाद आती स्वयंभू अवतरित होने की आत्मकला में सिद्धस्त होने की बारी तब वो बिना मानव स्त्री पुरुष के संभोग से हुयी मनुष्य सृष्टि से उतपन्न नही होकर स्वयं लीलावत प्रकट और लोकलीला करते आत्मलोक को प्रस्थान करते है। यही है अवतारवाद योग का सम्पूर्ण सिद्धासिद्ध सिद्धांत जिसमें उसे अहम सत्यास्मि की अशेष स्थिति प्राप्त होती है।
पुनः संक्षिप्त में-
!!सत्यास्मि गुरुवाद दर्शन!!
गुरु की चार अवस्थाएं है-
-प्रथम गुरु जो कुंडलिनी को जगाकर षट्चक्र भेदन कराकर देहातीत चैतन्यता की अवस्था में प्रवेश करा देता है।यहाँ साधक पिंड शरीर से से ब्रह्मांड शरीर में प्रवेश कर जाता है।
-दूसरी बार गुरु की आवश्यकता विश्व गुरु की पड़ती है। यहाँ विश्व गुरु की साहयता से विश्व ब्रह्मांड शरीर जिसे “प्राण शरीर” भी कहते है उसे पार हो जाता है। परंतु उसे तब भी इष्ट सिद्धि नही होती है।
-तीसरी गुरु आवश्यकता में तीसरा गुरु ब्रह्म गुरु का होता है। जिसकी साहयता से साधक ब्रह्मसाक्षात्कार कराने में साहयक होता है। इस अवस्था में ही साधक सिद्ध भूमि में प्रवेश करता है। यहाँ जो भी गुरु मंत्र और गुरु शक्तिपात मिला है। उसके प्रत्यक्ष दर्शन होते है। यानि यहीं साधक अपने में छिपे ब्रह्म इष्ट का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है। यहीं साधक और गुरु तथा साधक का आत्मा इष्ट एक बन कर प्रत्क्षय होते है।ये सम्पूर्ण मनोमय से उर्ध्व आत्मशरीर की स्थिति है। यहीँ साधक सिद्ध होकर अहम ब्रह्मास्मि और सोहम् यानि की मैं ही वो एक ब्रह्म या वही हूँ की आत्म प्राप्ति करता है। ये भी अवस्था पूर्ण नही है।
चौथा गुरु की साहयता इस अंतिम अवस्था में पड़ती है। जिसे सदगुरु कहते है की- जहाँ अब सिद्ध को अपने ही आत्म दर्शन की प्राप्ति होती है। किसी भी अन्य की नही तब सदगुरू की कृपा से उसे पता चलता है, की ब्रह्म कोई दूसरी वस्तु नही है वो मैं ही स्वयं हूँ। इसी आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति ही आत्मा का चरम लक्ष्य है।
ठीक यही सब गुरुवाद समाप्त हो जाते है तब कोई भेद शेष नही होता तब अहम सत्यास्मि की प्राप्ति होती है और सर्वत्र चैतन्यता जीवंतता की ही शाश्वत आत्मानुभूति में स्थिर स्थिति हो कर अशेष अवस्था मैं हूँ में पूर्णत्व होता है यही वास्तविक मौन अवस्था कहलाती है।
इस विषय को गहरे ध्यान और चिंतन से समझा जा सकता है,यो इस लेख को ध्यान से पढ़े।

 

 

माँ पूर्णिमा देवी की मूर्ति स्थापना से घर की दुख दरिद्री दूर होती है। घर में शांति आती है। बिगड़े कार्य सफ़लता में बदल जाते हैं। धन, यश, वैभव, शिक्षा आदि की समृद्धि आती है। जीवन सफ़लता की ओर अग्रसर हो जाता है।

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और महंत श्री शिवकुमार जी-09058996822
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माँ माँ है वे बहुमूल्य है- जो मांगेगा मिलेगा।।

!!जय पुर्णिमाँ महादेवी की जय!!

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः

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