श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज वैसे तो हस्तरेखा विज्ञान के 7 भाग पहले ही आपके समक्ष रख चुके हैं यह आठवां भाग है। हस्तरेखा विज्ञान का हर भाग अनमोल और विशिष्ट है। उन सब में कुछ न कुछ ऐसा है जो आपके जीवन में ढेरों बदलाव ला सकता है। अगर आप पीछे के बाकी भाग पढ़ना चाहते हैं तो इस आर्टिकल के अंत में आपको बाकी के पार्ट मिलते जाएंगे।
इसके अलावा श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज के अनमोल ज्ञान का भंडार इंटरनेट पर भरा पड़ा है और ख़बर 24 एक्सप्रेस के भी पास है।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज को पढ़ने के बाद बहुत सारी परेशानियों से छुटकारा पाया जा सकता है इसके अलावा आप जब भी अपने जीवन में अंधकार महसूस करें तो स्वामी जी से मिलने के बाद वह भी दूर हो जाएगा।
हस्तरेखा विज्ञान (भाग -7) सूर्य पर्वत से जानें जीवन के छिपे अद्भुत राज, हाथ में सूर्य पर्वत की यह स्थिति लाती है पद, पतिष्ठा और जीवन में खुशियां
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज से जानते हैं राहु पर्वत के बारे में : –
राहु और केतु कोई ग्रह नहीं है,बल्कि ये छाया बिंदु है,यो इन्हें जीवन के अंत यानि मृत्यु के बाद का और मृत्यु के बाद मिलने वाले नव जीवन यानि जीव का गर्भ में जो समय बीतता है,उससे लेकर जीवन के प्रारम्भ यानि पुर्नजन्म और पूर्वजन्म का शेष और सन्धिकाल में मिलने वाले फल के ये प्रतीक बिंदु है।ये युग हो या तीनों काल या वर्ष या समय के सन्धिकाल यानि क्षण के ग्रह होते है।यो इन्हें ग्रह यानि घर माना है।इनका बड़ा प्रभाव होता है,ये जीवन में होने वाली अचानक घटनाओं के माध्यम से मनुष्य को मिलने वाला शुभ या अशुभ परिणाम बताते है।ये अचानक शब्द कुछ नहीं होता है-इसका बड़ा व्यापक अर्थ है-यानि ये अचानक ही का अर्थ ही, अतिरिक्त शुभ अशुभ कर्म का फल मिलना होता है।
मृत्यु के बाद जो जीवन बीतता है,वो और जीवन के बीच बीच में जो अचानक और अप्रत्याशित घटनाएं होती है।चाहे वो बिन सोची घटनाएं होती है-जैसे-किसी की सम्पत्ति मिलनी,गढ़ा धन मिलना या गोद लिया जाना,अचानक मृत्यु या मृत्यु के बाद अचानक जी उठना,प्रगाढ़ प्रेम के बाद अचानक धोखा होना,घर के गिरने या वाहन से दुर्घटना या भूकम्प से हानि,किसी जीव कुत्ते,घोड़े,गाय,भेंस आदि के आने से लाभ या हानि होना,स्वप्न में दीक्षा होनी या पितरों या देव दर्शन से सिद्धि होनी आदि।राहु की शुभ स्थिति ही रंक से राजा बनाती है और अशुभ स्थिति ही राजा को रंक बनाती है।
औरकेतु पर्वत का स्थान मस्तक रेखा के नीचे और जीवन रेखा के बराबर से भाग्य रेखा के दोनों और चन्द्र पर्वत के ऊपर तक होता है।इसके विषय में अगले लेख में बताऊंगा।
* राहु पर्वत का हाथ में स्थान ह्रदय रेखा के नीचे और मस्तिक रेखा के ऊपर के बीच के भाग में सूर्य पर्वत के नीचे से शनि पर्वत से गुजरते हुए गुरु पर्वत के प्रारम्भ तक ही होता है।भाग्य रेखा इस ही पर्वत से गुजर कर शनि पर्वत पर जाती है।
* यदि कोई रेखा राहु पर्वत से निकल कर सूर्य पर्वत पर या उसकी ऊँगली अनामिका के पहले पर्व पर चढ़े,और अनामिका ऊँगली पर चक्र हो,तो वो व्यक्ति किसी भी शोधकर्ता विषय की खोज से या विज्ञानं के विषय का प्रसिद्ध वैज्ञानिक होता है।
इसी सबके साथ यदि व्यक्ति का हाथ गठान वाली सीधी उँगलियों और उनके बीच में दुरी हो यानि कलात्मक हो,तो व्यक्ति प्रसिद्ध जादूगर या किसी कलात्मक अभिव्यक्ति को अभिव्यक्त करने वाला अभिनेता होता है।
ऐसे व्यक्ति को अचानक लाटरी या दबा धन या शेयर में अप्रत्याशित धन लाभ या किसी भी सट्टेबाजी में धनपति योग प्राप्त होता है।
*यहाँ स्पष्ट क्रॉस का सूर्य पर्वत के नीचे ह्रदय और मस्तक रेखा के बीच में और भाग्य रेखा से अलग हो,तो व्यक्ति योगिक क्रियाओं से सिद्धि प्राप्ति किये होता है,और यही स्पष्ट क्रॉस भाग्य रेखा दूसरी और यानि शनि पर्वत के नीचे और ह्रदय और मस्तक रेखा के बीच हो,तो व्यक्ति में प्रेत या उपदेवता या देवी या कुलदेवी आदि से सम्बंधित रहस्यवादी विद्या और साधना से प्राप्त तांत्रिक सिद्धियों का होना बताती है।
*पर यदि ये क्रॉस कुछ बिगड़ा हो और संग में सूर्य रेखा या भाग्य रेखा टूटी फूटी हो या उसमें कोई यव हो तो,व्यक्ति अपने ऐसे ज्ञान और सिद्धि सामर्थ्य का दुरूपयोग करता है,क्योकि उसका कारण उसकी सिद्धि और सामर्थ्य में कुछ न कुछ कमी होती है,यो वो उसके साथ आडम्बर का सहारा लेता है।और जहाँ आडम्बर होगा,वहाँ दुरूपयोग तो होगा ही।और उस व्यक्ति का अंत अच्छा नहीं होता है।
* ह्रदय और मस्तिष्क रेखा के बीच राहु क्षेत्र में यही अस्पष्ट क्रास गुरु पर्वत के नीचे हो,तो व्यक्ति अपने पद का दुरूपयोग करता है और अपने अधीनस्थ स्त्रियों का शोषण करना और पुरुषों को सेवक भांति उपयोग करना उद्धेश्य बन जाता है।और स्पष्ट क्रास होना और गुरु पर्वत सही हो तो, व्यक्ति उच्चकोटि का अपने धर्म के प्रमुख मत या सिद्धांत का कर्मकांड आदि सभी क्रियाओं के ज्ञान सहित सर्वोच्च धर्म नेता या महामण्डलेश्वर आदि होता है और यदि इसी सबके साथ उसकी मस्तक रेखा जीवन रेखा से अलग हो और ह्रदय रेखा ब्रह्स्पति पर्वत पर चढ़ी हो और सूर्य रेखा अच्छी या पर्वत अच्छा हो या भाग्य रेखा भी प्रबल हो,तो व्यक्ति स्वतंत्र धर्म या सिद्धांत को निर्मित करके उस मत का सर्वोच्च धर्म नेता या अचानक राजनेतिक क्षेत्र में मंत्री और मुख्य मन्त्री पदाधिकारी बनता है।
* इसी राहु क्षेत्र में यानि ह्रदय रेखा और मस्तक रेखा के बीच एक स्वतंत्र सीधी रेखा हो,जिसका प्रारम्भ और अंत नीचे को गिरने से नहीं हो,तो ये अतिरिक्त मस्तक रेखा या अन्तर्दृष्टि या इंटीयूशन रेखा होती है और उस व्यक्ति में सामान्य से अधिक और असाधारण मस्तक की अद्धभुत क्षमता होती है,जिसके बल से वो भूतकाल में और बहुत हद तक भविष्यकाल में झांक कर स्पष्ट घटनाक्रम को बताता हुआ, भविष्यवाणी कर सकता है।ऐसी रेखा कीरो भविष्यवेत्ता के हाथ में पहले नहीं थी,बल्कि उसके रहस्यमयी विद्या के साधना करने से उभरी और उसे विशेषकर मनुष्य के भूतकाल को स्पष्ट रूप से देख कर,बिलकुल सही भविष्वाणी करने की शक्ति प्राप्त हो गयी थी,यो ये सम्पूर्ण राहु रेखा थी,जिससे वो अचानक और स्तब्ध करने वाली भूतकाल की घटनाओ को बताने के कारण प्रसिद्ध भी हुआ।
*कुछों में ये आधी ही रेखा होती है,जो मस्तक रेखा में मिल जाती है,यो ये कालसर्प रेखा यानि नकारात्मक राहु रेखा कहलाती है।यो उस व्यक्ति का भाग्य अचानक चमकता और बुझ जाता है।किये कर्म का फल कम या मिलता ही नहीं है या दूसरे को मिल जाता है।
* यहाँ पर आकर भाग्य रेखा कमजोर हो जाये या टूट जाये और कोई अन्य रेखा ऊपर को नही बने या चले,तो व्यक्ति को उसका भाग्य 35 के बाद और 45 से 55 वे वर्ष के बीच कमजोर होकर उसके सभी कार्य और पद और प्रसिद्धि में कमी देता है यानि धोखा मिलता और देता है।और यदि यहां से भाग्य रेखा प्रबल होकर उठे,तो व्यक्ति को अचानक भाग्य वश कोई पद और प्रतिष्ठा में व्रद्धि की प्राप्ति होती है,यानि राजनीती में या सामाजिक क्षेत्र में जाना पड़ा, तो उसे दूसरे के किये कर्म का परिणाम पद आदि के रूप में बिना प्रयास के एक या अनेक बार प्राप्त होता है।ऐसी राहु रेखा का भाग्य रेखा में मिलकर बनने से ये योग नोकरी या बिजनेस छोड़कर आये,व्यक्तियों के साथ होता देखा गया है।
इसे ही उच्च का कालसर्प दोष बोलते है।
* यहां पर्वत उठा हो तो,व्यक्ति को अचानक में ही बिना प्लानिंग बनाये, उसके सारे काम पूर्ण होते है।
*यदि हाथ में राहु पर्वत विकसित हो तो ये जातक भाग्यवान होते । इनका मन धार्मिक प्रवर्ति का होता है ।
इनकी समाज में अच्छी मान प्रतिष्ठा होती है ।
* यदि यह पर्वत हतेली के मध्य में ही उठा हुआ यानि विकसित होता है, तो ये जातक अपने यौवन समय में गलत कार्यो में पड़कर अपने जीवन में बदनाम हो जाते है । यदि राहु पर्वत का हथेली में आभाव है और भाग्य रेखा राहु पर्वत पर आकर टूट गयी हो तो ये जातक अपने यौवन काल को भिखारी की तरह व्यतीत करते है।
उपाय:-वही है,जो मैने पीछे के लेखों में बताया है,की- राहु पर्वत को अपने दूसरे हाथ की उंगलियों या अंगूठे से थोडा मालिश करके और दबाकर जब उसमें स्पर्श का अच्छी अनुभूति हो तो,उसकी को आँख बंद करके अपना गुरु मन्त्र जपते हुए या ॐ रां राहुवे नमः मंत्र का जप करते ध्यान करें।तो अवश्य आपको राहु से होने वाली सभी परेशानियों से लाभ मिलेगा।
*टेस्ट करके गोमेद को बीच की ऊँगली में चांदी में जड़वाकर तिल के तेल से स्नान कराकर,फिर पंचाम्रत से स्नान कराकर शुक्रवार को सूर्य उदय से पहले के समय में या अस्त के बाद के समय में यानि संधिकाल में पहनना चाहिए।
विशेष ज्ञान:-और राहु का जप और केतु के जप और ध्यान भी दिन और रात्रि के सन्धिकाल में करना चाहिए।क्योकि ये समय के सन्धिकाल यानि क्षण के देवता है।ये सब विषय “क्षण विज्ञानं” के अंतर्गत आता है। ये बड़ा गम्भीर रहस्य है,जो गुरु से समझना चाहिए।तभी इसकी सिद्धि होती है।इस विषय में कभी और बताऊंगा।
“इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं? घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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