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योग से निरोग तक : कपालभाति से कैसे रोग से करें अपने को निरोग? बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

 

 

 

 

कहते हैं योग से निरोग जीवन जीने की एक आसान कला है। यह ज्ञान, ध्यान, भौतिक, भावनात्मक, आत्मिक,आध्यात्मिक कला की ओर ले जाने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

 

 

योग का अर्थ “एकता’ या ‘बांधना’ है। योग करने वाले के पास किसी भी प्रकार का रोग, शोक, संताप, तनाव, अनिद्रा और बीमारी पास नहीं फटकती है। वैसे यदि आपके पास योगासन करने का समय नहीं है तो आप सूर्यनमस्कार या कपालभाति जैसे योग करने से ही स्वस्थ बने रह सकते हैं।

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज जी के मुताबिक अगर आपको जीवन में किसी भी प्रकार की परेशानी जैसे रोग, शोक, मोटापा, तनाव, अनिद्रा, श्वास, गर्जन, रीढ़, रक्त चाप या पेट से सम्बंधित रोग इत्यादि हैं तो योग एक ऐसा साधन है जिससे आप सभी परेशानियों को दूर कर सकते हैं।

 

आज श्री सत्यसाहिब स्वामी कपालभाति के बारे में बता रहे हैं।

कपालभाति :
रोग से करे निरोग…

 

कपाल’ का अर्थ है माथे में स्थित (सहस्त्रार) तथा भाति का अर्थ है-चमकना या जाग्रत होना। चूंकि इस क्रिया से सिर यानि कपाल में स्थित सहस्त्रार चक्र की जागर्ति होकर वो प्रकाशित और सम्पूर्ण है, अतः इसे कपालभाति कहते हैं। कपालभाति एक ऐसी सांस की प्रक्रिया है,जिसके माध्यम से हम अपनी प्राणवायु से जुड़ते है,और इस प्रक्रिया के द्धारा हमारी प्राणवायु जो सिर तथा मस्तिष्क की क्रियाओं को चल रहे सामान्य जीवन और उसकी शक्ति का विस्तार करके नई जीवन शक्ति प्रदान करता है।

कपालभाति क्रिया को अन्य प्राणायाम एवं आसान से पहले किया जाता है।

यह सारे मस्तिष्क को अपनी निरन्तर प्राण शक्ति देने से एक नवीन तेजी प्रदान करती है तथा निष्क्रिया पड़े उन मस्तिष्क केंद्रों में व्याप्त 84 लाख न्यूरॉन्स सेल्स को जागृत करती है, जो मनुष्य के स्थूल से लेकर समस्त सूक्ष्म ज्ञान के लिए उत्तरदायी होते हैं। कपालभाति में सांस उसी प्रकार ली जाती है, जैसे लोहार की लोहे को गर्म कर उसे पिघलने के लिए धौंकनी चलती है। सांस तो स्वतः ही ले ली जाती है,परंतु उसे छोड़ा पूरे बल लगाते हुए धक्के के साथ जाता है।

!!कपालभाति!!

आप सहजासन में सीधे बैठें, आँखें बंद करें एवं शरीर को बहुत कम तनाव के साथ संपूर्ण ढीला छोड़ दें।

अब दोनों नाकों से सांस लें, जिससे पेट फूल जाए और पेट की पेशियों को बल के साथ सिकोड़ते हुए सांस छोड़ दें।

अगली बार सांस अपने आप ही खींच ली जाएगी और पेट की पेशियां भी स्वतः ही फैल जाएंगी। सांस खींचने में किसी प्रकार के बल का प्रयोग नहीं होना चाहिए।

एक धीरे धीरे और लगातार करते हुए सांस धौंकनी के समान चलनी चाहिए।

कपालभांतिको तेजी से कई बार दोहराएं। यह क्रिया करते समय पेट फूलना और सिकुड़ना चाहिए।
आप इसको 1 मिनट में लगभग 30 बार तो करें ही।और एक मिनट के 30 बचे सेकेंड में रुके।मतलब जेसे एक कपालभाति किया तो फिर 1 सेकेंड को रुके फिर कपालभाति किया।जब एक माह हो जाये,तब आप ये समय अंतराल घटा सकते है। यो करते हुए 75 कपालभांति करते हुए रुके और कुछ समय बाद फिर 75 करें और ऐसे 5 बार करें। और फिर 150 कपालभाति के बाद रुके और विश्राम के बाद फिर 150 करें।यहाँ संख्या केवल समझने को दी गयी है।

आप इसको 500 बार तक कर सकते हैं।

अगर आपके पास समय है तो रुक रुक कर इसे आप 5 से 10 मिनट तक कर सकते हैं।आधा घण्टा तक किया जाना उत्तम कपालभाति कहलाता है।

वैसे तो कपालभाति के बहुत सारे लाभ है,जिनमें प्रमुख निम्न प्रकार से है की-

कपालभाति लगभग हर बिमारियों को किसी न किसी तरह से रोकता है।

कपालभाति को नियमित रूप से करने पर अधिक बढ़ा हुआ वजन घटता है और मोटापा में बहुत अधिक तक अंतर देखा जा सकता है।

कपालभाति अभ्यास से त्वचा में स्निग्ता और निखार देखा जा सकता है।

यह आपके झड़ते हुए और कम आयु में सफेद होते बालों के लिए बहुत अच्छा है।

कपालभाँति से अस्थमा के रोगियों के लिए एक तरह रामबाण है। इसके नियमित अभ्यास से कुछ समयानुसार अस्थमा को बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

कपालभाति से साँस की नली के अवरोध दूर होते हैं तथा इसकी अशुद्धियां एवं बलगम की अधिकता भी दूर होती है।
कपाल भाति शीत, राइनिटिस (नाक की श्लेष्मा झिल्ली का सूजना), साइनसाइटिस तथा श्वास नली के संक्रमण के उपचार में ओषधि के साथ साथ चलते हुए बहुत उपयोगी है।

कपाल भाति से उदर में तंत्रिकाओं को सक्रिय करती है, उदरांगों यानि पेट की मासपेशियों और आंतों की मालिश करती है तथा जिससे आपके पाचन क्रिया में बहुत सुधार आता है।

कपालभाति से हमारे फेफड़ों की क्षमता में बहुत वृद्धि होती है।

कपाल भाति से मस्तिष्क के आज्ञाचक्र की ग्रन्थि पर निरन्तर प्राण वायु की टक्कर लगते रहने से वो शुद्ध होकर जाग्रत होती है तथा स्थूल से लेकर सूक्ष्म मस्तिष्क में बड़ी सक्रिय बढ़ती है।
हमारी दृष्टि के दोषो को नष्ट करती उसे स्वस्थ बनाती है।
कपाल भाति से मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र और ह्रदय चक्र व् कंठ चक्र पर निरन्तर आघात लगते रहने से मूलाधार के दोष-पुरुष की यूरिन समस्या और धातु दोष दूर होकर कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में सहायक होती है।व् स्वाधिष्ठान चक्र से व्यक्ति में अनावश्यक अहंकार का नाश होकर उसमे सहजता आती है और ह्रदय चक्र में प्राणवायु का प्रवेश से वहाँ भाव शुद्धि होने से समस्त भावनाएं शुद्ध और पवित्र होकर ध्यान में उत्तम दर्शन की स्थिति प्राप्त होती है।कंठ चक्र के शुद्ध होने से अपशब्द और अनावश्यक क्रोध आना बन्द होकर शब्दों में शुद्धता व् नियंत्रण बनता है और कण्ठ मधुर बनता है।
कपाल भाँति कब्ज की शिकायत को दूर करने के लिए बहुत लाभप्रद योगाभ्यास है।

सांस भीतर स्वतः ही अर्थात् बल प्रयोग के बगैर ली जानी चाहिए तथा उसे बल के साथ छोड़ा जाना चाहिए।परन्तु कपालभाति करते में व्यक्ति को इससे दम घुटने जैसी अनुभूति नहीं होनी चाहिए।तब आप जाने की आप गलत कर रहे है।तब थोड़ा रुके और अपनी क्रिया को देखें और समझ कर फिर से करना शुरू करें।तब आपको सम्पूर्ण लाभ अवश्य मिलेगा।

हृदय रोग, चक्कर की समस्या, उच्च रक्तचाप, मिर्गी, दौरे, हर्निया तथा आमाशाय के अल्सर से पीड़ित व्यक्तियों को यह क्रिया नहीं करनी चाहिए।तब केवल ये लोग अनुलोम विलोम क्रिया को ही करें।वो भी धीरे से साँस खींचे और ऐसे धीरे से साँस छोड़े जिसका पता खुद को भी सुनाई नहीं पड़े यानि बहुत ही धीमें करें।ऐसा पहले अनुलोम विलोम क्रिया 15 बार ही करें।

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः

www.satyasmeemission.org

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