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कालसर्प दोष क्या है? जीवन पर पड़ने वाले इसके असर को जानें, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

 

कालसर्प दोष क्या है? इसका जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? ये सब श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज बता रहे हैं।

 

स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज कहते हैं कि कालसर्प दोष पर कुछ लोगों ने डर ज्यादा फैलाया हुआ है। बहुत से कथित विदद्वान ज्योतिषियों ने (जिनको खुद ज्ञान नहीं होता है) इसको व्यापारिक दृष्टि से डरावना बना दिया है, जिससे लोग घबरा जाए और उनके बताए उपाय करने पर मजबूर हो जाएं।

 

“जब अज्ञानी किसी को जीवन ज्ञान देने लग जाये तो लेने और देने वाले दोनों बुद्धिहीन ही कहलायेंगे। इससे न तो ज्ञान की प्राप्ति होगी और न ही भला होगा। अब ऐसे इंसान के जीवन में चाहे कालसर्प दोष हो या साढ़ेसाती, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

 

आइये जानते हैं कि कालसर्प दोष क्या है?

कालसर्प दोष क्या और कैसे बनते है और इनका जन्मकुंडली के 12 घरों में 12 प्रकार के नामों से मनुष्य के जीवन में क्या क्या अनिष्टकारी प्रभाव होता है और उसका सही उपाय क्या है, जिसे करते ही जीवन सफल और सुखी हो?..

-जब आपकी जन्मकुंडली में सात गृह- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि जब राहू और केतु के बीच स्थित होते है तो कुंडली में ये कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! मान लो यदि कुंडली के पहले घर में राहू स्थित है और सातवे घर में केतु है, और बाकी के सभी ग्रह पहले घर से अब चाहे वे पहले घर में राहु के साथ ही बेठे हो तब से सातवे घर तक केतु के साथ हो अथवा उलटे सातवे घर में राहु के साथ होकर अब पहले घर केतु के साथ या इनके बीच होने चाहिए ! यहाँ पर एक और बात ध्यान देने योग्य यह है की- सभी ग्रहों की डिग्री राहू और केतु की डिग्री के बीच स्थित होनी चाहिए, यदि कोई गृह की डिग्री राहू और केतु की डिग्री से बाहर आती है तो पूर्ण कालसर्प योग स्थापित नहीं होगा, इस स्थिति को हम आंशिक कालसर्प कहेंगे।जन्म कुंडली में बनने वाला कालसर्प कितना दोष पूर्ण है, यह राहू और केतु की अशुभता पर निर्भर करेगा ! यानि राहु और केतु अपनी राशि में बेठे हो तो शुभ अन्यथा अशुभ फल देते है।और वक्री होने पर वे अपना शुभ या अशुभ परिणाम अपनी महादशा या जिसके साथ बेठे या उनका योग है,उस ग्रह के साथ मिलकर उस ग्रह की महादशा या अंतर्दशा में पहले देंगे। जोकि आप अपनी जन्मकुंडली के महादशा के पृष्ठ पर जाकर देख सकते है।

-अधिकतर शनिदेव की साढ़े साती और काल सर्प योग का नाम पंडित या ज्योतिषी से सुनते ही लोग घबरा जाते हैं। इन योगों के प्रति लोगों के मन में जो भय बना हुआ है इसका लाभ उठाकर बहुत से ज्योतिषी लोगों को लूट रहे हैं। अब बात करें कालसर्प दोष के 12 योग की तो इसके भी कई रूप और नाम हैं। काल सर्प को दोष नहीं बल्कि एक प्रकार का ज्योतिषीय योग ही कहना उत्तम रहेगा।

-काल सर्प का सामान्य अर्थ यह है कि-काल माने समय-जो की पूर्वजन्म में बीता और बिताया गया शुभ कर्म करके अथवा अशुभ कर्म करके हो,तब उसका फल-सर्प यानि शाप या मृत्युदायक या वरदान-यहाँ वरदान में भी वरदान की मात्र कम होकर दोष के रूप में मिलेगा-ये कालसर्प दोष कहलाता है अर्थात जब ये ग्रह कि स्थिति आएगी, तब सर्प दंश के समान व्यक्ति को अपने जीवन में कष्ट होगा। पुराने समय में ज्योतिष में राहु तथा अन्य ग्रहों की स्थिति के आधार पर काल सर्प का आंकलन किया जाता था। आज ज्योतिष शास्त्र को वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर नये नये शोध हो रहे हैं। इन शोधो से कालसर्प दोष या योग की परिभाषा और इसके विभिन्न रूप एवं नाम के विषय में भी और अधिक जानकारी मिलती है। वर्तमान समय में कालसर्प योग की जो परिभाषा दी गई है उसके अनुसार जन्म कुण्डली में सभी ग्रह राहु केतु के बीच में हों या केतु राहु के बीच में हों तो कालसर्प योग बनता है।

-कालसर्प योग के नाम:-

ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक भाव के लिए अलग अलग कालसर्प योग के नाम दिये गये हैं। इन काल सर्प योगों के प्रभाव में भी बहुत कुछ अंतर पाया जाता है- जैसे कि-

-1-अनंतकालसर्प दोष:-
जिसकी जन्मकुंडली में राहु पहले घर में और केतु सातवें घर में हो तब ये अनंतकालसर्प दोष बनता है।
लग्न और सप्तम घर में राहु केतु अकेले है,तो व्यक्ति अपने ही पितरों में से पुनर्जन्म लेता है,बस यहाँ स्त्री प्रधान ग्रह-चंद्र-शुक्र- से स्त्री व् पुरुष प्रधान ग्रह-सूर्य-मंगल-गुरु- से पुरुष शरीर अथवा उसके गुण या अवगुण लिए विचार और शरीर की धारण कर जन्म लेता है।
और किसी शुभ ग्रह के पहले भाव में साथ उच्च का राहु होता है यानि वृषभ राशि और केतु सातवें घर में वृश्चिक राशि,तो ये व्यक्ति अपने उच्च विचार योजनाओ को व् आदर्शों को फेलाने और उनका फल प्राप्ति को स्वयं भू गुरु बनकर जन्म लेता है।यहां गुरु के साथ राहू का योग उच्च का होने से नवीन सम्प्रदाय का गठन करता है और उसमें नवीन पद्धति से मन्त्रयोग और तांत्रिक योग की पराकाष्ठा से लक्ष्य और सिद्धि की प्राप्ति होती हैं।और नीच का राहु झूठी विद्या से लोगों को ठगना और किसी पैशाचिक शक्ति के द्धारा लोगों के लिए बुरे कार्य-मुठ, चोकी,जीव की बलि चढ़ाना आदि क्रिया करने से पीड़ा देकर मनवांछित धन और वस्तु कमाने से ये दोष बनता है।अंत दुखद होता है।

-2-कुलिक कालसर्प दोष:-
जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में राहु दूसरे घर में हो और केतु आठवें घर में हो तब ये कुलिक दोष बनता है।
कुलिक का अर्थ ही कुल यानि परिवार से है और यहां ये योग बनने से उस व्यक्ति को कभी भी अपने कुल परिवार से साहयता नहीं मिलती और उनसे सदा वेमनस्य और विवाद बने रहते है,परिवारिक सम्पत्ति में भी कम और संघर्ष से प्राप्त होता है।उसके ऊपर कुल देवता या देवी का शाप होता है और अपने कुल या परिवार के बड़े व्यक्ति का अपमान किया होने से या परिजन की सम्पत्ति को हड़पने से ये दोष लगता है,यो पूवर्जन्म के परिजन उस काल और वर्तमान तक इसे स्मरण करके उसकी निंदा करते रहने से उसे निरन्तर शाप मिलने से ये कुलिक कालसर्प दोष का प्रभाव बना रहता है।यो उसे अपने कुल देवता और कुल देवी त्तथा पितृओं को स्मरण कर नित्य पूजा समय क्षमा मांगनी चाहिए और उनके लिए अलग से जप तप दान करना चाहिए। यदि पूर्वजन्म में अपने बड़े भाई जो की उससे कमजोर होता है,उसकी कमजोरी का फायदा उठाकर उसके साथ अन्याय करने से ये दोष बनता है।यो व्यक्ति का पराक्रम और परिश्रम बलहीन बने रहने से उसे सदा परिजनों और समाज में नोकरी और व्यवसाय में प्रारम्भ और अंत में पराजय या अपमान का मुख देखना पड़ता है।

3-वासुकि कालसर्प दोष :-
जन्मकुंडली में तीसरे घर में राहु और नवम घर में केतु हो तो ये वासुकि दोष बनता है।
वासुकि से अर्थ ही स्पष्ट होता है की- ये जातक पूर्वजन्म में विष्णु के अवतारों में से किसी एक का उपासक रहा होता है अथवा पीताम्बरा देवी बगलामुखी की साधना के फल से लोगों को सताया होता है और उस पंथ के गुरु द्धारा बताये गए नियमों में मनचाहा परिवर्तन करने और गुरु अवज्ञा करने तथा कोई अपना उस सम्बंधित मन्त्र बनाकर जपने के दोष से शापित होता है,यो उसे पुनः वेष्णव या वैष्णवी दोष से पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है,साथ ही पूज्य वट व्रक्ष को कटा होता है,साथ ही किसी पूज्य बड़े पीले रंग के सर्प को अनावश्यक और घमण्ड से भरकर मारा होता है, और इसी कारण उसे जीवन के सभी क्षेत्रों में धोखे मिलते है।

4-शंखपाल कालसर्प दोष :-
जिसकी कुंडली में राहु चोथे घर में और केतु दसवें घर में हो तो ये शंखपाल योग बनता है और ये दोष जीवन में घटते है-
घोघों की अनावश्यक हत्या और शंख में शराब पीने के दोष से तथा विशेषकर अपनी माता को व्रद्धावस्था में उनके किये उपकारों को भूलकर उन्हें व्यंग्यबाणों से बारम्बार दुखित करना और उन्हें एकांत में छोड़ देना और उनकी म्रत्यु समय कोई विशेष सेवा भी नहीं करने तथा उनकी म्रत्यु उपरांत उनके जप अनुष्ठान,ब्रह्म भोज को पूर्णता से नहीं कराने का दोष होता है और अपनी माता अथवा अपने आश्रित सास की सम्पत्ति या पेंशन आदि का अपने स्वार्थ में उपयोग करने का परिणाम ये दोष होता है।और अपने घर के पूजाघर को गलत दिशा में स्थापित करना और वहाँ बिन गुरु या इष्ट आज्ञा से गलत दिशा में यानि अग्नि कोण को छोड़कर किसी अन्य कोण में अखण्ड ज्योति जलाकर पूजा करने का भी दोष होता है।साथ ही किसी की प्रापर्टी को बिना उसकी मर्जी के बिक्री करने जैसा धोखा देना या उसमें अपना लाभ अधिक रखने से उस व्यक्ति को पता चलने पर उसका शाप का दोष होता है।

 

5-पद्य् कालसर्प दोष:-

पाचवें घर में राहु और ग्यारहवे घर में केतु हो तो ये पद्य कालसर्प दोष बनता है और..
इस योग में पति पत्नी पुत्र की लालसा से कन्याओं की भ्रूण हत्या करने का दोष होता है तथा कोई अध्यापक या गुरु अपने अधीन किसी भी विषय, ज्ञान, विद्या की शिक्षा दीक्षा पा रहे किसी विद्यार्थी या शिष्य को सही से विद्या और दीक्षा नहीं देकर उसका समय बरबाद करने के दोष का ये शाप होता है।अर्थात आपके जीवन का कोई भी शिक्षा से लेकर ओरम विवाह सन्तान और शिष्य तथा नोकरी कार्य केवल बीज रूप में ही बना रहकर सम्पूर्णता की प्राप्ति नही पाता है अर्थात वो प्रारम्भिक कली ही बना रहकर पुरे पुष्प यानि पद्य में नहीं खिलता है।और जो भी आय हो उसमें कटौती होती है,आय कर्ज में जाती है और आय के साधन बदलते और नए खुलकर शीघ्र ही अच्छा परिणाम देकर शीघ्र ही बन्द हो जाते है,उसे अनावश्यक चलाये रखने में कर्ज हो जाता है।आपकी आय का अधिक हिस्सा आपको नहीं दिया जाता,उसे मार लिया जाता है।व्रद्धावस्था में सन्यास योग बनता है और तपस्या की और आगामी जीवन की और बढ़ता है।

6-महापद्य कालसर्प दोष :-
जिसकी जन्मकुंडली में छठे घर में राहु और बारहवें घर में केतु हो तो ये दोष बनता है।
ये घर ननसाल और गुप्त प्रेम तथा गुप्त शत्रु के साथ मूलाधार चक्र से नीचे शक्ति चक्र का सीधे भाग से सम्बंधित है यो इस दोष में ननसाल के पितृ यानि मातृकुल के दोष का प्रभाव व्यक्ति पर उसकी माता के पीहर या अपनी ननसाल में किये की गए दोषों से बनता है,उसका भाई और भाभी को प्रताड़ित करने में अपने माता पिता की उकसाने से होता है और अपने भाई की सम्पत्ति में उसके द्धारा सब कुछ किये जाने के उपरांत भी हिस्सा मांगने या उस पर मुकदमा किये जाने से बनता है और अपनी बहिन को धोखा देने से बनता है और व्यक्ति को अपनी ममेरी और मौसेरी भाई बहिनों से धोखे किये से दोष बनता है तथा अपने देश में आये विदेशियों या अपरिचितों से मदद मांगने से उन्हें धोखा करने पर भी बनता है। किसी तांत्रिक गुरु के द्धारा सिखाई गयी विद्या को उसकी बिना अनुमति के किसी को सिखाना और तांत्रिक गुरु को धोखा देने से तथा जो भी गुप्त और अद्रश्य शक्ति के उस पर प्रसन्न होने से उससे लोगों को हानि पहुँचाने से उस शक्ति के अप्रसन्न होने से उसकी सभी विदेश यात्राओं में हानि उनके बार बार टल जाने के योग या विदेशियों या अपरिचितों से और लुभावनी गुप्त लाभ योजनाओ से जुड़ने से सदा धोखा मिलने का दोष मिलता है।

7- तक्षक कालसर्प दोष:-
इस तक्षक योग की स्थिति अनन्त कालसर्प योग के ठीक विपरीत बनती है-जैसे-यहाँ राहु सातवें घर में होता है और केतु पहले घर में-यो इस योग में व्यक्ति की पत्नी या स्त्री का पति विवाह के बाद सदा किसी न किसी रोग से बीमार बना रहता है,उसका निदान नही होता है,चाहे पति या पत्नी कितनी ही जप पूजापाठ करता रहे,बस बचा रहता है।और उसके पुत्री की अपेक्षा पुत्र अधिक होंगे,पर उनके भी किसी न किसी की नजर आदि से बहुत महनत के उपरांत भी उत्तम परिणाम या भविष्य फल नहीं मिलता है।बाकि बच्चों का भविष्य उनके व्यक्तिगत पुरुषार्थ से बदल न जाये।यो कार्य सब होंगे पर बड़े परिश्रम के बाद।ये दोष-
किसी अन्य की पत्नी या पति को अपने प्रभाव से अपने अनुकूल बनाकर उसका शोषण करना और अपने पार्टनर या जीवन साथी को धोखा देना और उससे आपके प्रति विश्वास के चलते उससे धोखे से कागजो पर साइन कराकर उसे उसके हिस्से से बेदखल कर देना ही इस तक्षक दोष का प्रमुख शाप है।यो व्यक्ति को यौन रोग या गुप्तांग में कष्ट और उनकी दवाई चलती रहती है और ऐसे ही उसके पार्टनर धोखा देते है।जैसे को तैसा मिलता है।विवाह उपरांत आपस में शक भ्रम से कलह बनी ही रहती है और तांत्रिक से ठगे जाते रहते है।और विद्यार्थी को जिस विषय की तैयारी करने के उपरांत उसे वो विषय या कोर्स की कई बार में भी प्राप्ति नहीं होता है।और उन्हें कोर्स कोई और कम्पनी या कार्य करने का स्थान कोई और कहीं और मिलता है।

8- कर्कोटक कालसर्प दोष :-
व्यक्ति की जन्मकुंडली में राहु आठवें घर में और केतु दूसरे घर में होने से ये कर्कोटक कालसर्प योग बनता है,जिससे मनुष्य जीवन में ये समस्या भोगता है।
यो इसका अर्थ ही कठिन और कटुता,कर्कश और क्रूरता,भयावहता है और ये दोष व्यक्ति को इस प्रकार की वाणी का प्रयोग से शाप रूप में मिलता है-जेसे अपने नोकरो को गाली देकर बुलाना और मित्रों को भी ऐसे ही पुकारना तथा जरा सी बात का बतंगड़ बनाकर अपने परिजनों को अपशब्द और कोसते रहने से ये दोष अधिक बनता है और परिणाम सभी क्षेत्रो में उसे अपयश और पद प्रतिष्ठा में निम्नता और धन में कमी व् कर्जे के रूप में मिलता है।और उसके पीठ पीछे गुप्त अफवाहों से भी बदनामी होती रहती है।उसे गुप्त रूप से किये गए तांत्रिक अनुष्ठानों से गुप्त हानि होती रहती है और उसे पता भी नहीं चलता है और उससे उसका जीवन भर कर सुख चैन चला जाता है। मस्तिष्क के एक भाग विशेषकर सीधे भाग में दर्द उठना और इस भाग की स्मरण शक्ति में कमी से शरीर में कमजोरी और इससे नीचे के भाग से गुप्त रोगों की व्रद्धि होती है और आँख में जल्दी कमजोरी आती है।भूल से गलत या पुरानी दवाई खाने से या विष के दिए जाने से प्राण संकट में पड़ जाते है।

9- शंखपाल कालसर्प दोष :-
जन्मकुंडली के नवम घर में राहु और तीसरे घर में केतु के होने से ये शंखचूड़ कालसर्प योग बनता है और इस योग से व्यक्ति को जीवन में इन कारणों से निम्न परिणाम झेलने पड़ते है की-
घोघों की अनावश्यक हत्या और शंख में शराब पीने के दोष से तथा विशेषकर अपनी माता को व्रद्धावस्था में उनके किये उपकारों को भूलकर उन्हें व्यंग्यबाणों से बारम्बार दुखित करना और उन्हें एकांत में छोड़ देना और उनकी म्रत्यु समय कोई विशेष सेवा भी नहीं करने तथा उनकी म्रत्यु उपरांत उनके जप अनुष्ठान,ब्रह्म भोज को पूर्णता से नहीं कराने का दोष होता है और अपनी माता अथवा अपने आश्रित सास की सम्पत्ति या पेंशन आदि का अपने स्वार्थ में उपयोग करने का परिणाम ये दोष होता है।और अपने घर के पूजाघर को गलत दिशा में स्थापित करना और वहाँ बिन गुरु या इष्ट आज्ञा से गलत दिशा में यानि अग्नि कोण को छोड़कर किसी अन्य कोण में अखण्ड ज्योति जलाकर पूजा करने का भी दोष होता है।साथ ही किसी की प्रापर्टी को बिना उसकी मर्जी के बिक्री करने जैसा धोखा देना या उसमें अपना लाभ अधिक रखने से उस व्यक्ति को पता चलने पर उसका शाप का दोष होता है।

10- घातक कालसर्प दोष :-
जन्मकुंडली के दसवें घर में राहू और चौथे घर में केतु होने से ये घातक योग बनता है।जिससे व्यक्ति को जीवन में निम्न दोष से हानि उठानी पड़ती है की-
पिता को प्रताड़न और उनके धन सम्पत्ति को हड़पना और उनके बार बार मना करने पर भी उनसे धन लेजाकर उन पर कर्ज की स्थिति खड़ी करने से तथा अपने सुसर को प्रताड़ित करना और अपने अधिकारी या बड़े प्रशासनिक अधिकारी को उसके द्धारा किये गए आप पर विश्वास को चोट पहुँचाने से और जिस कम्पनी या सरकारी विभाग में नोकरी कर रहे है उसमें उनके आप पर विश्वास किये जाने पर धोखे करने से ये दोष बनता है।इससे दिल की कमजोरी और ह्रदय में कोई रोग या उसकी समस्या बनी या अचानक बनती है।उसकी दवाई चलती ही रहती है।

11- विषधर कालसर्प दोष ;-*
ग्यारहवे भाव में राहु और पांचवे घर में केतु हो तो,ये विषधर योग बनता है,
ग्यारहवा विभिन्न प्रकार की आय और विद्या से आय की प्राप्ति का ओर पंचम घर प्रेम का भी होता है यो इस कारण ऐसा व्यक्ति राहु शुक्र या चन्द्र राहु या बुध राहु योग से अपने जीवन में अनेक प्रेम प्रसंग बनाता है,जिसका मुख्य उद्धेश्य केवल मनोरंजन होता है और विपरीत लिंगी के उससे अटूट प्रेम किये जाने पर उसे धोखा में रखना और अंत में उससे सम्बन्ध तोड़ लेने का शाप उसे अनेक जीवन तक निष्कलंक प्रेम नही मिलने के प्रेम भंग दोष के रूप में भोगना पड़ता है।
ऐसे विद्यार्थी की स्मरण शक्ति अच्छी नही होती यो एकाग्रता भंग से शिक्षा में मनवांछित परिणाम की प्राप्ति नहीं होती है।और सर्विस को जितने नम्बर चाहिए उतने नहीं मिलने से इच्छित नोकरी नहीं मिलती है।
दूसरे की आय में उसके प्रतिशत को धोखे से हड़पना और आप लोगों के बीमा एजेंट होने पर उन्हें धोखा देना।अपने पुत्र की पत्नी से सम्बन्ध या शिष्य या शिष्या से प्रलोभन देने से बनाये गए अनैतिक सम्बंधों से और जब उसने मना किया तब उसे डरना और उससे धन वसूली करने से ज्यादा ये दोष बनता है।किसी परिचित या किसी स्त्री के कोई सन्तान नहीं होने पर अथवा उसके अधिक पुत्री ही होने पर उसे पुत्र नहीं होने का प्रतारणा देने से ये निसन्तान होने या निकम्मी सन्तान के होने का शाप मिलता है।अपने पण्डित या गुरु से कराये गए जाप अनुष्ठान का उसे उचित दान नहीं देने से साथ ही उसमे दोष निकाल उन्हें हतोउत्साहित करने से ये उनके द्धारा निसंतान या निष्क्रिय सन्तान द्धारा प्रतारणा का शाप होता है।

12- शेषनाग कालसर्प दोष :-
जब व्यक्ति की जन्मकुंडली में राहु 12 वे घर में और केतु छठे घर में हो तो ये शेषनाग कालसर्प दोष योग बनता है।
ये दोष इसके नाम से बड़ा है पता चलता है-नागों का राजा शेषनाग-
इस योग में राहु व्यक्ति के जीते जी उससे बड़ा ही परिश्रम करता है और मृत्यु उपरांत उसे बड़ी प्रसिद्धि देता है, यहॉ उच्च का गुरु या राहु का योग सिद्ध फकीर या संत बनता है और उच्च का शुक्र या राहु योग गुप्त दानवीर बनाता है और उच्च का सूर्य या राहु किसी पंथ का संस्थापक प्रसिद्ध सिद्ध शिष्य बनाता है और उस पर गुप्त रूप से सिद्ध गुरु आशीष बना रहता है।और निम्न राहु या अन्य निम्न ग्रह से युक्ति से व्यक्ति अपने आजीवन के जीवन संघर्ष के अनुभवी भुगते या देखे अनुभवो को लिख कर ग्रन्थ से म्रत्यु उपरांत प्रसिद्धि पाता है।इसका मुख्य कारण होता है,अपने पूर्वजीवन में वो अपने गुरु का या जिससे कुछ असाधारण विद्या सीखी है,उसका नाम पूछने पर नहीं बताता है,बल्कि उसे अपना अनुभव बताता है,यो ये शाप बनता है और ऐसे ही किसी के द्धारा दिए गए दान करने के धन को वहां जाकर अपने द्धारा किया दान बताने का दोष होता है और ऐसे ही किसी ग्रह आदि के दोष से पीड़ित मनुष्य के द्धारा दिए गए साधनों-घी,तेल,सामग्री,पैसे या वाहन या गाय,बकरी आदि का उपयोग अपने घर या सिद्धि के लिए करने से प्राप्त सिद्धि का यश उसे उस जीवन में नहीं मिलता है,उसे अनेकों बार अपयश मिलता है,उसके देखते देखते उसका जीवन भयंकर श्रम में बीतता है और मृत्युउपरांत उसका यश बढ़ता है,जिसका फल जाने या अनजाने रूप में वहीं व्यक्ति उस गद्दी या पद या धन या पुरुष्कार आदि से प्राप्त करता है,जिसको इस व्यक्ति ने धोखा दिया था।यो ये शेष या अतिरिक्त रह गया नाग यानि दोष शेषनाग कालसर्प दोष कहलाता है।

सभी 12 कालसर्प दोष के सर्वश्रेष्ठ उपाय :-

यदि आप महंगे जप अनुष्ठान,रुद्राभिषेक और किसी तीर्थ पर जाकर यज्ञानुष्ठान आदि कराने में असमर्थ है तो आप इन सर्वश्रेष्ठ उपायों को अवश्य करें और सभी कालसर्प दोष से मुक्त होकर शुभ कल्याण पाये।
– सर्प का अर्थ ये नही लगाना चाहिए की-हमने ये बारह प्रकार के सर्प मारे है,अन्यथा तो सभी की जन्मकुंडली में उन्होंने जो चूहे मारे और जो कांक्रोच मारे छिपकली मारी उन सबके दोष ईश्वर की दृष्टि से सर्पों के मारने के पाप के सामान ही है।
वो हमारी कुंडली में भर जायेंगे और हमारे अन्य कर्मो को जगहां नहीं बचेगी। सदा स्मरण रखे की-काल माने पूर्वजन्म का शेष बचा कर्म और उसका फल और वर्तमान जन्म में पूर्व जन्म का शेष कर्म के शेष फल से नवीन कर्म का जन्म होना है,यो अपने संग घट रहे दोषों के परिणामों को जानकर उसका निदान सही से कर्म करना है और नवीन कर्म के करने से वर्तमान और भविष्य के जन्म को शुभ कर्म से सही करना और यही सर्प यानि नवीन संकट से बचाव होगा।यो सबसे पहला उपाय है कि-
1- अपने कर्मो को सुधारे की अब जो हो गया सो हो गया-अब फिर से बुरे कर्म नहीं करेंगे।और इस प्रकार के शुभ कर्म करने के संकल्प में पूर्वजन्म के बुरे कर्म बड़ी बांधाएं डालेंगे और बार बार नियम टूटेगा,पर निराश नहीं..बल्कि फिर से उत्साह से शुभ कर्म करने की और लग जाना।तब जैसे-आपके ही द्धारा किया गया-लगातार बुरे कर्म ने आपको ये वर्तमान में बुरा समय दिखाया है,यो ही आपका किया प्रत्येक शुभ कर्म परिजनों से लेकर बहार के अनेकों लोगों की दुआ बनकर तुम्हे एक दिन अवश्य ही मनवांछित सफल जीवन की प्राप्ति करा सभी और से सुखी कर देगा।

– 2-किसी सुयोग्य गुरु से गुरु मंत्र की दीक्षा लेकर उसका नियम से मंत्र जप और दान तथा मुख्य गुरु और आश्रम में होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों में अपनी और से अधिक से अधिक उपस्थिति के साथ साथ पूरी लगन से सेवा देकर गुरु आशीर्वाद से मनवांछित सुख की प्राप्ति की जा सकती है,ये तो संसार का सबसे सरल और सम्पूर्ण सफल अनुभूत उपाय है।जो अनगिनत दोषों से सबसे जल्दी मुक्ति देता है।क्योकि गुरु इस संसार ने ईश्वर के प्रत्यक्ष स्वरूप को लेकर पीड़ितों के कल्याण को आया है,यो वो तो आपके छोटे से प्रयास को भी बढ़ाकर सम्पूर्ण बना देता है।
धर्म इतिहास में अवतारों ने भी अपने श्री गुरुओं और महात्माओं और सन्तों की सेवा से जो चाहा उस दोष का निवारण पाया है।
जैसे-भगवान राम ने रावण की वध के ब्रह्महत्या के दोष निवारण को अपने गुरु विश्वामित्र जी और वशिष्ट जी से निदान के रूप ने नाथ पंथ में दीक्षा लेकर कानों में कुण्डल आदि संस्कार धारण करके ब्रह्महत्या से मुक्ति पायी थी।
श्री कृष्ण ने भी महाभारत में धर्म के पक्ष में कराये अनेक योद्धाओं के वध का प्रायश्चित को अनेक तीर्थों पर जाकर वेदव्यास जी से उपाय जानकर जप तप दान से निवारण कर मुक्ति पायी थी।
यो सभी प्रकार के कालसर्प दोष के योगों का सबसे सरल उपाय गुरु बनाकर उसकी शरण लेना है।
-अब आता है-
1-सबसे पहले अपने पूजाघर की दिशा इस प्रकार से ठीक करें की-आपका मुख पूजा करते में पूर्व को और रहे।
यदि ये सम्भव नहीं है तो-अपना मुख पूजा करते में उत्तर में रहे।

2-और इसके उपरांत अपने सोने की दिशा को सही करें।
आपका सिरहाना सोते समय पूर्व या उत्तर की और रहना चाहिए।
3-अपने जन्मतिथि के नम्बर के जोड़ का एक अंक निकाल कर-जैसे-आपकी जन्मतिथि है-6 या 15 या 24 तो 6 तो एक अंक हुआ ही,पर 15 या 24 का 1+5=6 और 2+4=6 यो आप 6 नम्बर के उस अंक का रुद्राक्ष यानि छः मुखी रुद्राक्ष या ये महंगा हो-जैसे की-1अंक वाले को एक मुखी तो आप 10 यानि 1+0=10 का दस मुखी रुद्राक्ष भी आपको उपयोगी रहेगा यो उसको अपने लकी नम्बर के दिन यानि जन्मतिथि जैसे-6 तारीख या 15 तारीख आदि को लाकर उसे पंचाम्रत से स्नान कराकर अपने गुरु मंत्र के कम से कम 108 बार जप करके अपने गले में पँच रंगी या सप्त रंगी धागों से बनी डोरी में डाल कर गले में पहन ले और प्रत्येक माह की अमावस्या और विशेषकर पूर्णमासी को इसी प्रकार पंचाम्रत से डोरी सहित स्नान कराकर गले में पहन ले और पंचाम्रत को फूल वाले पोधे पर चढ़ा दे।तो ऐसा जबतक करे की जबतक आपको शांति नहीं मिल जाती है।
4-अपने सोने के बिस्तर पर सिरहाने के सीधी और एक फिटकरी का टुकड़ा और उलटी और गन्धक का टुकड़ा बिस्तरे या गद्दे के नीचे रखे और पूर्णिमां के दिन इसे निकाल कर बहती नदी में ये कहते बहा दे की-हे-ईश्वर मेरे बुरे कर्मो को क्षमा करना और मेरी सारी बुरी आदतों को इन फिटकरी और गन्धक के द्धारा लेकर मुझ पर कृपा करो।और उसी दिन नई फिटकरी और गन्धक लाकर फिर से ऐसे ही रखे और शांति पाने तक ऐसे ही करते रहे।अवश्य कल्याण होगा।
5-अपने माता पिता के नित्य चरण छूकर अपने पूर्वजन्मों के कर्मो का मन ही मन प्रायश्चित करते आशीर्वाद ले तो अति शीघ्र चमत्कारिक कल्याण होकर सर्व दोष शांत होकर शुभ फल देंगे।क्योकि माता पिता कैसे भी हो,पर उनसे ज्यादा कोई अपनी सन्तान को नही चाहेगा।
6-अपने से बड़ो का सम्मान करो।
7- अपने पास के मन्दिर में सम्भव हो, तो वेसे तो ये करना ही चाहिए की प्रातः की आरती या शाम की आरती में अवश्य शामिल हो और ज्योत और प्रसाद ले कर घर में बांटकर खाये।
8-किसी भी आश्रम में जाकर महीने में एक बार अवश्य साधुओं की भोजन खिलाया करें।और छः माह में मौसम के अनुसार उन्हें कपड़े भेंट करके आये और आशीर्वाद ले।और आश्रम या मन्दिर में यज्ञ के लिए घी,सामग्री आदि देकर आया करें।
मन्दिर में स्वयं सेवा दोगे तो अति शीघ्र ही सर्व दोषों से मुक्ति मिलेगी।
मन्दिर में झाड़ू और पोछा खरीद -कर दे आया करें।
– अपने जो भी इष्ट भगवान या कुलदेवी देवता हो उन्हें अवश्य सप्ताह में नहीं तो पूर्णिमां के दिन पंचाम्रत से और फिर स्वच्छ जल में गंगा जल मिलाकर स्नान कराया करें।तो अवश्य कल्याण होगा।
-अपनी छत को सदा स्वच्छ रखा करें।वहां कोई पक्षी की बीट नहीं रहने दे।
-अपने घर की छत पर कभी भी किसी के भी कहने पर अपने पितरों का स्थान बना कर नहीं रखना चाहिए।
और यदि रखे हो तो तुरन्त किसी भी पूर्णिमासी के दिन उन सबको ईंटों आदि सहित गंगा जी में ॐ पितृदेवाय नमः के जप करते हुए श्रद्धा पूर्वक विसर्जन करके आना चाहिए।
-घर में यदि अपने माता पिता या किसी प्रतिष्ठित प्रिय पूर्वज की तस्वीर टांग रखी हो तो उस पर सप्ताह में एक बार जब उनका जन्मदिन की अथवा उनके स्वर्गवासी होने की तारीख या तिथि हो तब अवश्य ही फूलों की माला चढ़ानी चाहिए और ऐसे ही माला चढ़ाते रहना चाहिए।और पुरानी माला की नदी में विसर्जित करना चाहिए।
-चारों नवरात्रियों-चैत्र-ज्येष्ठ-क्वार-माह में कम से कम एक अथवा नो कन्याओं को उनके सम्पूर्ण वस्त्र, खाना, दक्षिणा सहित दान करने चाहिए।
-एक कटोरी खीर सबसे पहले 41 दिन लगातार बनाकर सब बैठ जाये और उन बेठे हुआ से 7- 7 बार उल्टा उतार कर तथा कोई या स्वयं किसी वजह से कहीं बाहर चले गए तो कोई भी परिवार का व्यक्ति उस खीर को आपके फोटो से 7 बार उल्टा ( एंटी क्लॉकवाइज) उतार कर अपने घर से बाहर के कैसे भी रंग के कुत्ते कुतियाँ हो उसे खिला आये, यदि किसी पड़ोसी आदि को कोई एतराज नहीं हो, तो घर के बाहर ही कुत्तों को खिला दे अन्यथा तो अपनी गली से बाहर खिला आये या पास के मन्दिर के पास कुत्तों या भिखारियों को दे दे।स्मरण रखे गाय को नही खिलाये।और 41 दिनों के बाद मंगल-शनिवार-अमावस्या और पूर्णिमासी को जबतक शन्ति नहीं हो ऐसे बनाकर 7 बार उल्टा उतार कर कुत्तों को खिलाते रहे,तो अवश्य ही कैसा भी राहु और केतु ग्रह का कालसर्प दोष हो,वो अवश्य ही शांत होकर शुभ फल देगा।क्योकि कुत्ते नो के नो ग्रहों के प्रिय वाहक है।और मनुष्य के सबसे हितेषी जीव होते है।यो इसके द्धारा सर्व ग्रह और दोषों का निवारण होता है।

 

 

 

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स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः

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