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सत्य पर असत्य की जीत… त्रिपुरा की जीत पर मनीष कुमार की विशेष पेशकश, जरूर पढ़ें और शेयर भी करें

आप सबने असत्य पर सत्य की जीत जरूर सुनी होगी। लेकिन आज सत्य पर असत्य की जीत को देश की जनता ने होते देखा।
कई बार सच पर झूंठ भारी रहता है लेकिन इतना भारी रहता है यह #माणिक_सरकार को कभी उम्मीद नहीं रही होगी।

“#वामपंथी विचारधारा होने के बाबजूद माणिक सरकार ने इस विचारधारा को त्रिपुरा पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने #त्रिपुरा के लिए जो कुछ किया शायद ही किसी ने किया हो या कर पायेगा।”

माणिक सरकार ने अपने प्रदेश की जनता के आगे शायद अपनी खुशियों को भी नहीं देखा तभी तो आजतक उन्होंने किसी सरकारी सुविधा का मजा नहीं लिया और न ही किसी दिखावे को बढ़ावा दिया। सादगी हमेशा उनकी पसंद रही। तभी वे लगातार कई वर्षों से #चुनाव जीतते आ रहे थे।
लेकिन इस बार कुछ ऐसा हुआ जो उन्हें कभी उम्मीद भी नहीं रही होगी। माणिक सरकार चुनाव प्रचार भी पैदल घूम-घूमकर करते रहे हैं। वे जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनने वाले चुनिंदा मुख्यमंत्रियों या नेताओं में से एक रहे।  हमेशा की तरह उन्होंने न हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया न किसी लग्जरी कारों के काफिले का इस्तेमाल किया।
किसी भी तरह के धन-बल का इस्तेमाल माणिक सरकार ने नहीं किया, किसी भी सरकारी मशनीरी का गलत इस्तेमाल माणिक सरकार ने नहीं किया। माणिक सरकार के ऊपर आजतक किसी भी तरह के सीधे आरोप न लगे और न साबित हुए। माणिक सरकार को जो सरकारी तनख्वाह मिलती रही उसे वो पार्टी फण्ड में जमा करवा देते थे और पार्टी की तरफ से उनको मात्र 5000 रुपये महीने मिलते थे। साइकिल से अपने मंत्रालय जाने वाले माणिक सरकार की कुल संपत्ति मात्र 27 लाख रुपये है। जिसमें उनकी पत्नी की आय, पेंशन और उनका घर भी शामिल है। माणिक सरकार या उनकी पत्नी के पास अपनी निजी कार नहीं है और उनकी पत्नी सरकारी कार का इस्तेमाल नहीं कर सकती हैं। अगर उनकी पत्नी को किसी कार्य के लिए बाहर जाना भी पड़े तो वो रिक्शे का इस्तेमाल करती हैं।

“त्रिपुरा #नॉर्थईस्ट का एक छोटा सा प्रदेश है। त्रिपुरा क्या पूरा नार्थईस्ट बहुत सुंदर होने के बाबजूद केंद्र की सरकारों ने हमेशा इन #सेवन_वंडर्स को नजरअंदाज किया। केंद्र सरकार की ज्यादा  मदद न मिलने के बाबजूद माणिक सरकार ने त्रिपुरा को कभी टूटने नहीं दिया। जबकि त्रिपुरा तीन तरफ से #बांग्लादेश की सीमाओं से घिरा हुआ है।”

आज यह स्पष्ट हो गया कि सच पर झूंठ हावी रहता है। लोगों को सिर्फ दिखावा चाहिए। तो ठीक है खुश रहिये इस दिखावे में। धनबल आपके लिए नहीं है “त्रिपुरा की जनता”, यह सिर्फ चुनाव जीतने के लिए हथकंडा था। जीत गए, अब देखते रहिये। पूरा देश जुमला झेल रहा है। इससे आप भी कहीं अछूते नहीं रहे हैं। अब इसको और ढंग से झेलियेगा।

4 साल बाद भी पूरा देश अच्छे दिनों के इंतजार की कतार में है। अब आप भी कतार में लग जाइये।

अब बात करते हैं भाजपा की जीत की:

भाजपा ने त्रिपुरा का किला बेशक फतह कर लिया हो लेकिन यह जीत बिलकुल भी आसान नही है। आगे चलकर भाजपा को इस जीत के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। जिसकी सीधी मार त्रिपुरा की जनता पर पड़गी।
भाजपा की इस जीत में कांटे भी बहुत सारे हैं। भाजपा ने त्रिपुरा जीतने के लिए जिन संगठनों का सहारा लिया है वो वहां के अलगावादी संगठन कहलाते हैं। ये वही संगठन हैं जो बांग्लादेशी आतंकवादियों के साथ मिलकर काम करते हैं।

अब ऐसे में भाजपा के इस चुनावी गठबंधन से एक बात जो आश्चर्य पैदा करती है वो ये है कि महज चुनावी जीत के लिए अलगावादी संगठन “जनजातीय पार्टी, इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा” (आईपीएफटी) के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़  लेती है। इस संगठन के साथ जो लोग और बाकी संगठन काम करते हैं उनकी मांग ठीक वैसी ही है जैसे कश्मीर के अलगावादी संगठनों की। वे अलग प्रदेश से लेकर अलग देश के मांग करते हैं, जिस तरह कश्मीर के अलगावादी मांग करते हैं।

आइये अब जानते हैं कौन हैं माणिक सरकार? और क्या हैं त्रिपुरा के लिए उनकी उपलब्धियां:-

माणिक सरकार का जन्म 22 जनवरी 1949 में हुआ। वो 1998 से त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहे हैं। माणिक सरकार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) से संबद्ध रखते हैं तथा पार्टी पोलितब्यूरो के सदस्य भी हैं। 2013 के विधानसभा चुनावों के बाद वे लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बने।

सरकार अपना मुख्यमंत्री पद का वेतन व भत्ते पार्टी को दान देते हैं। पार्टी उन्हे 5,000 रुपये गुजारा भत्ता देती है। 2013 के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों के समय दायर शपथपत्र से पता चलता है कि वे भारत के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों में सबसे कम धनी व्यक्ति हैं।

बता दें कि माणिक सरकार की पार्टी वाम मोर्चा ने जबरदस्त तरीके से त्रिपुरा में अपनी पकड़ जमा रखी थी। वह 1978 के बाद से 40 साल में केवल पांच साल 1988 से 1993 के बीच ही सत्ता से बाहर रही। बात करें 2013 में हुए चुनाव की तो माकपा को 60 में से 49 सीटें मिली थीं।

“यहाँ पर सवाल उठाता है कि आखिर माणिक सरकार के अंदर त्रिपुरा के लोगों को ऐसा क्या दिखा? जिसकी वजह से माणिक सरकार वहां के लोगों का भरोसा जीतने में इतने कामयाब रहे।”

तो हम आपको बताते हैं कि कैसे माणिक सरकार ने पिछड़े त्रिपुरा को एक प्रगतिशील त्रिपुरा बना दिया : –

त्रिपुरा पहले गरीब और पिछड़ा राज्य हुआ करता था। जिस समय माणिक सरकार ने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के तौर पर कमान संभाली, उस वक़्त त्रिपुरा कश्मीर की तरह एक अशांत राज्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका था। तीन तरफ से बांग्लादेशी सीमाओं से घिरा त्रिपुरा वहाँ के अलगावादी संगठनों और आतंकवादी गतिविधियों की वजह से त्राहि-त्राहि कर रहा था। लेकिन माणिक सरकार के कड़े फैसले, उनकी नीतियों और केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करने की नीति ने त्रिपुरा को प्रगतिशील बना दिया। इसी के चलते ही उन्होंने अशांत कहलाने वाले राज्य को विकास का अनुकरणीय मॉडल बना दिया।

विकास के त्रिपुरा मॉडल की तुलना करने के लिए मानव विकास सूचकांक को मानदंड माना जाता है। मानव जीवन के बारे में जानने के लिए बुनियादी सुविधाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल में सामान्य जन की हिस्सेदारी को भी काफी जरुरी माना जाता हैं। ऐसे में अपने प्राकृतिक संसाधनों के सामाजीकरण के हिसाब से त्रिपुरा की प्रगति अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से ज्यादा रही।

“पहाड़ी राज्य होने के कारण वहां विकास की गति में आने वाली कठिनाइयों मैदानी राज्यों के मुकाबले काफी ज्यादा होती हैं लेकिन इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र संघ की 2011 की मानव विकास सम्बधी रिपोर्ट में इस बात का साफ जिक्र किया गया है कि देश के सबसे छोटे राज्य का मानव विकास सूचकांक गुजरात जैसे समृद्ध कहलाने वाले राज्यों से बेहद अच्छा है।”

माणिक सरकार के त्रिपुरा राज्य में श्रम कानूनों का सख्ती से पालन किया जाता रहा है। जिसकी वजह से ही निजी कम्पनियों को किसी भी तरह के शोषण करने की इज़ाज़त नहीं होती है। क्योंकि वहां पर किसी भी अफसर और राजनेता को घूस लेने के लिए स्वतन्त्र नहीं थे। इसकी वजह से ही निजी कम्पनियों को काम करने में भी कोई परेशानी नहीं आती।

इसके साथ ही त्रिपुरा के पिछड़े क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएँ पंहुचाने के लिए त्रिपुरा सरकार ने सरकारी मैडिकल कालेज में प्रशिक्षित डाक्टरों को राज्य के पिछड़े इलाकों में एक कुछ समय सीमा में सेवाएं देने का नियम बनाया है। इससे राज्य के पिछड़े स्थानों पर भी प्रशिक्षित युवा डाक्टर अपनी सेवाएं आसानी से प्रदान करते रहे हैं। यह सब उस नेता का काम है जिसे जिसने त्रिपुरा की छवि को काफी बदल दिया।

ढाई दशक पहले त्रिपुरा भी दूसरे उत्तर-पूर्व के राज्यों की तरह अलगाववादी हिंसा से पीड़ित था। हालात इतने खराब थे कि 16 फरवरी, 1997 को सूबे में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (AFSPA)को लागू कर दिया गया। इसके करीब 18 साल बाद 28 मई, 2015 को त्रिपुरा सरकार ने इस कानून को अपने राज्य से हटा दिया। पंजाब के बाद ऐसा करने वाला त्रिपुरा दूसरा राज्य बना।
कहते हैं कि 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के वक़्त बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी शरणार्थी भारत आना शुरू हुए। त्रिपुरा बांग्लादेश की 856 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमा से घिरा हुआ है। त्रिपुरा के आदिवासियों ने इसे उनके क्षेत्र में गैर-जरुरी अतिक्रमण की तरह लिया। बंगाली हिन्दुओं के विरोध में 1978 में त्रिपुरा नेशनल वॉलेंटियर्स फ़ोर्स बनी। इसके नेता हुआ करते थे बिजॉय हरंगखावल। दस साल यह संगठन हथियारों के दम पर त्रिपुरा को स्वतंत्र देश बनाने के लिए संघर्ष करता रहा। 1988 में हरंगखावल ने आत्मसमर्पण कर दिया और चुनावी राजनीति में आ गए।

त्रिपुरा में अलगाववादी हिंसा का दूसरा उभार हुआ 1990 के दौर में जब त्रिपुरा में बसे बंगालियों को बाहर खदेड़ने और स्वतंत्र त्रिपुरा की मांग को लेकर 80 के अंत में दो बड़े अलगाववादी संगठन उभरे। पहला था 1989 में खड़ा हुआ नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT)। इस संगठन ने अपनी सशस्त्र टुकड़ी को नाम दिया नेशनल होली आर्मी (NHA)। दूसरा संगठन बना जुलाई 1990 में, इस संगठन का नाम था ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF) था।

31 मार्च, 1998 में त्रिपुरा में कम्युनिस्ट सरकार आए हुए एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था कि उसके हेल्थ मिनिस्टर व उनके भाई की हत्या कर दी गई। इस हत्या के पीछे नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा (NLFT) के उग्रवादियों का हाथ था। इसके तुरंत बाद माणिक सरकार हरकत में आये और वहां के उग्रवादियों को खदेड़ने का काम शुरू कर दिया।

ये वही माणिक सरकार थे जिन्होंने अपने प्रदेश से उग्रवाद को खत्म करने के लिए खुद की विदेश सुरक्षा नीति बनानी शुरू कर दी। इस नीति में केंद्रसरकार का हस्तक्षेप कम से कम रखा गया। माणिक सरकार ने सूबे के आला पुलिस अधिकारी जीएम श्रीवास्तव, मुख्य सचिव वीएम तुलिदास पर पूरा भरोसा जताते हुए सेना के खुफिया विभाग के एक अधिकारी की मदद से इन लोगों ने ऐसी रणनीति तैयार की, जिसके जरिए विद्रोहियों पर तेजी के साथ कड़ी मार की जा सके।

2003 और 2006 के बीच सुरक्षा बलों की स्पेशल यूनिट्स ने बांग्लादेश में छिपे आतंकवादियों पर 20 बार सर्जिकल स्ट्राइक की। इन हमलों से त्रिपुरा में रह रहे बांग्लादेशी आतंकवादियों की भी कमर टूट गयी।
इन सब में शेख हसीना का भी जबरदस्त समर्थन मिला। क्योंकि सिख हसीना को भारत की तरफ झुकाव वाला नेता माना जाता है। और 2008 में बांग्लादेश की सत्ता में शेख हसीना के आते ही उनका त्रिपुरा को जबरदस्त बहुमत मिला।

अब ऐसे में कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता त्रिपुरा की पहाड़ियों में अपनी पकड़ फिर से मजबूती से हासिल करने लगे। ऐसे में अलगाववादी संगठनों के पास बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा। ATTF और NLFT के गुरिल्ला तेजी से आत्मसमर्पण करने लगे। यह माणिक सरकार की सबसे बड़ी सफलता थी। और इस तरह कुछ ही सालों में त्रिपुरा में इंसर्जेंसी लगभग खत्म हो गई। हाँ कुछ दुर्गम पहाड़ी इलाको और सीमा से सटे गांवों में अभी भी अलगावादियों का बोलबाला है। वो गांव बेहद पिछड़े हैं वहाँ साक्षरता न के बराबर है। ये वही अलगावादी संगठन हैं जिनका साथ भाजपा को मिला है।

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Manish Kumar

+91 9654969006

Mail:  manish@khabar24.co.in

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**नोट :
इस लेख में सभी विचार मनीष कुमार के निजी विचार हैं उन्होंने इस लेख की जानकारी इंटरनेट के माध्यम एवं त्रिपुरा के लोगों से बातचीत करके जुटाई है। इस लेख में ख़बर 24 एक्सप्रेस का किसी भी तरह का योगदान नहीं है। अगर इस लेख से कोई आहत होता है या इस लेख में कुछ गलत पाया जाता है। तो खबर 24 एक्सप्रेस इसका उत्तरदायी नहीं होगा। लेखक की सभी जानकारी सार्वजनिक हैं।

 

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